जानिए कौन है वो इस्लामिक आतंकी दल ARSA, जो म्यंमार के बौद्धों के बाद अब बना चुका भारत के हिंदुओं के कत्ल का पूरा प्लान


आईये जानें, कौन है रोहिंग्या मुस्लिमों का आतंकी मिलीटेंट ग्रुप ARSA…???

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रोहिंग्या मुस्लिमों का आतंकी मिलीटेंट ग्रुप आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना (Arakan Rohingya Salvation Army) आखिर तैयार कैसे हुआ… और कौन हैं इसमें शामिल लोग…???
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अराकान रोहिंग्या रक्षा सेना (ARSA) उत्तरी म्यांमार के रखाइन प्रांत से संचालित होती है. रखाइन प्रांत रोहिंग्या मुसलमान बहुल इलाका है जहां सबसे ज़्यादा हिंसा हुई है. यहां रह रहे लोगों को म्यांमार सरकार ने नागरिकता देने से इंकार कर दिया है और इन्हें बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासी घोषित किया है.
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लंबे समय से म्यांमार में जातीय हिंसा हो रही है. पिछले साल एक सशस्त्र रोहिंग्या विद्रोह शुरू हो गया. एआरएसए पहले दूसरे नामों से जाना जाता था जिसमें से एक था हराकाह अल-यकीन, इस संगठन ने 20 से ज्यादा पुलिसकर्मियों की हत्या की है.
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हाल ही में इस विद्रोही सेना ने 25 अगस्त को रख़ाइन प्रांत में पुलिस पोस्ट पर बड़ा हमला कर 12 लोगों की हत्या कर दी थी.
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म्यांमार सरकार का कहना है कि यह एक चरमपंथी संगठन है जिसके नेता विदेश से प्रशिक्षण लेते हैं. अंतरराष्ट्रीय संकट समूह (ICG) ने 2016 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में भी यह दावा किया कि रोहिंग्या विद्रोही सेना के लोग सऊदी अरब में रह रहे हैं. आईसीजी के अनुसार एआरएसए का नेता अता उल्लाह का जन्म पाकिस्तान में हुआ और वह सऊदी अरब में पले बढ़े.
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कैसे हथियार हैं इनके पास ?
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25 अगस्त को पुलिसकर्मियों पर हुए हमले के बाद सरकार ने कहा कि इन हमलावरों के पास चाकू और घर में बनाए बम थे. विद्रोहियों के पास अधिकांश हथियार घर में बने हैं.
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लेकिन ICGकी रिपोर्ट बताती है कि एआरएसए में शामिल लोग पूरी तरह से अनुभवहीन नहीं हैं. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इस विद्रोही सेना के लोग दूसरे संघर्ष में शामिल लोगों से भी मदद ले रहे हैं जिसमें अफ़ग़ानिस्तान के लोग भी शामिल हैं.
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कब शुरू हुआ ARSA ?
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ARSA के प्रवक्ता के मुताबिक इस विद्रोही सेना ने साल 2013 से प्रशिक्षण शुरू कर दिया था. लेकिन इस सेना ने पहला हमला अक्टूबर 2016 में किया, जिसमें 9 पुलिसकर्मी मारे गए थे.
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मकसद
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ARSA के मुताबिक इनका मकसद म्यांमार में, वहाँ रह रहे रोहिंग्या समुदाय के लोगों की हुकूमत कायम करना है. उनका कहना है कि वे रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार की नागरिकता दिलाना चाहते हैं और म्यांमार सरकार में उनका प्रतिनिधित्व दिलवाना चाहते हैं. 
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ICGकी रिपोर्ट बताती है ARSA में शामिल अधिकतर युवा रोहिंग्या पुरुष हैं. ये सभी साल 2012 में हुए दंगों के बाद सरकार के खिलाफ हथियारबंद हुए हैं. रोहिंग्या के ये युवक नावों के जरिए अपना इलाका छोड़कर मलेशिया की तरफ जाने का प्रयास करते थे, लेकिन साल 2015 में मलेशियाई सेना ने इनके रास्तों को रोक दिया जिसकी वजह से हज़ारों लोग समुद्र के बीच में फंस गए.
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इसके बाद सेना और विद्रोहियों के बीच हिंसा का दौर शुरू हो गया. सुरक्षा बलों ने काफी कड़े तरीके से इस हिंसा से निपटने का प्रयास किया. 
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विद्रोह का नतीजा
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ARSA द्वारा पुलिसकर्मियों पर किए गए हमलों की वजह से सेना ने इनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की है. सेना के अनुसार वे आम नागरिकों पर हमला करने वाले उग्रवादियों के ख़िलाफ़ लड़ रही है.
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रोहिंग्या लोग रखाइन प्रांत से भागकर बांग्लादेश की तरफ जा रहे हैं. लेकिन वहां बने शरणार्थी शिविर भी लगभग भर चुके हैं. रखाइन के हिंसाग्रस्त इलाकों में मीडिया के जाने पर कड़े प्रतिबंध हैं.
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बड़े हैरत की बात है कि इस्लाम के नाम बड़ी-बड़ी बातें करने वाले 56 मुस्लिम देशों में से अब तक किसी भी देश ने इन रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए अपने दरवाज़े नहीं खोले हैं. यहाँ तक कि बांग्लादेश जोकि इनका मूल देश है, उसने भी इन्हें अपने यहाँ लेने से इंकार कर दिया है. 
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अब ये रोहिंग्या मुस्लिम उदार देश की छवि वाले देश भारत की ओर देख रहे हैं. इन्हें लगता है कि भारत के अलावा दुनिया में और कोई भी देश उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकता.

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