प्रकाशित हुआ पहला रिसर्च.. भारत से कितना धन लूट कर गये थे अंग्रेज.. आज भी इतनी राशि है कल्पना से परे

आज लन्दन की चमचमाती सडको को देख कर और ब्रिटेन की ऊंची ऊंची इमारतों को देख कर अगर आपको आश्चर्य होता है कि उनके पास इतने विकास के लिए धन कहाँ से आया तो थोडा इतिहास में झाँक कर देखने की जरूरत है.. ये वो शान शौकत है जो सोने की चिड़िया के पंख नोच कर बनाई गई है.. ये धन उस विश्वगुरु का है जिसको बाद में उन्होंने विकासशील देश बना डाला और खुद विकसित देश का तमगा ले कर बैठ गये हैं .. लेकिन सच को ज्यादा देर तब दबाया नहीं जा सकता है .

यही वजह थी कि भारत माता के सच्चे सपूतों की आँखों में उन अंग्रेजो को देख कर खून उतर आता था उस समय . मंगल पाण्डेय , भगत सिंह , सुभाष चन्द्र बोस, राम प्रसाद बिस्मिल , चन्द्रशेखर आज़ाद आदि योद्धाओं ने उस सच को बहुत पहले से जान लिया था कि अंग्रेजो ने भारत माता को लूटा है और हर दिन माँ का दोहन कर रहे हैं . उन्हें यकीनन दुःख हुआ होगा वो देख कर जब तथाकथित आज़ादी के ठेकेदार उन्ही अंग्रेजो के साथ बैठ कर मीटिंग किया करते थे और उनकी हां में हाँ मिलाया करते थे .

अब एक रिसर्च ने पहली बार बताया है वो अथाह धनराशि जितना लूट कर अंग्रेज भारत से गये हैं . ये अनुमानित धनराशि वर्ष 1765 से ले कर वर्ष 1938 के बीच की है . ये रिसर्च कोलंबिया युनिवर्सिटी के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्स पटनायक ने तमाम तथ्यों और आकंड़ो के साथ प्रकाशित की है . इन आकड़ो के अनुसार सन 1765 से ले कर सन 1938 के 173 वर्ष के अंतराल में अंग्रेज लगभग 45 ट्रिलियन डालर धनराशि भारत से लूट कर अपने देश ले कर गये हैं .

अगर 45 ट्रिलियन डालर को रूपये के हिसाब में जाना जाय तो ये धनराशि लगभग 3,13,10,82,00,00,00,000 रूपये होगी ..  ये धनराशि उस समय काल में लूटी गयी है जो आज की गणना के हिसाब से गिनती से भी परे होगी.. भारत और भारतीयों द्वारा लूटे गये इसी पैसे से अंग्रेजो ने अपने देश को विकसित किया और अफ़सोस की बात है कि इसी पैसे से उन्होंने बाद में उन मिशनरियों को पाला पोशा जो भारत में धर्मांतरण का गंदा खेल खेल रहे हैं . उस धन को ले कर अपना धर्म बदल रहे कुछ लोगों को ये भी नहीं पता कि वो पैसा उन्ही के पूर्वजो का वो धन है जिसको आज उनके धर्म को खरीद कर उन्हें दे रहे साजिशकर्ता ही लूट कर गये थे .

नामी स्तम्भकार Jason Hickel (  academic at the University of London and a Fellow of the Royal Society of Arts ) ने बाकायदा इस लेख को आंकड़ो के साथ प्रकाशित किया है .

 

 

 

 

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