कभी पाकिस्तान सरकार ने बनाया था धर्मांतरण रोकने का कानून. लेकिन हर देश में संविधान और सेकुलरिज्म ही सर्वोपरि नहीं, भारत की तरह

सेकुलरिज्म आदि की बातो को ही भारत का आधार माना जाता है . इतना ही नहीं अगर बात संविधान की हो तो भारत के भगवा वस्त्र धारी साधू संत तक उसको सर्वोपरि बता कर उसके अनुसार ही चलने का संकल्प लेते हैं . लेकिन क्या आप को पता है कि दुनिया में तमाम देश ऐसे भी हैं जहाँ पर सरकारी नियम कानून और संविधान ही नहीं सेकुलरिज्म भी जा कर दम तोड़ देती है.. उन तमाम देशो में एक है भारत का वो पडोसी पाकिस्तान जहाँ मजहबी कट्टरपंथ अपने चरम पर है.

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पाकिस्तान के ये कट्टरपंथी वही हैं जो कुछ सदियों पहले ही धर्मान्तरित किये गये थे और अब अपने ही मूल मत अर्थात पूर्वजो के सिखाये संस्कारों के दुश्मन बने घूम रहे हैं . पाकिस्तान की सरकार में और वहां के कट्टरपन्थियो में कौन ज्यादा ताकतवर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पाकिस्तान ने एक प्रदेश से ये शुरुआत की थी कि 18 साल से छोटे हिन्दू या ईसाई आदि के गैर मुस्लिम बच्चो को मुसलमान नहीं बनाया जा सकता है तब उसका अंजाम क्या हुआ था .

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बात कुछ ही समय पहले की ही है जब 18 साल से कम उम्र के बच्चों के धर्म परिवर्तन पर रोक के लिए क़रीब दो साल पहले सिंध प्रांत में क़ानून बना था, लेकिन कभी लागू ही नहीं हुआ। उस समय पाकिस्तान के मजहबी कट्टरपंथी मुस्लिम समूह वाले सडको पर आ गये थे और सरकार के इस कानून को अपने कानून के हिसाब से गैर इस्लामिक करार दे डाला था . इतना ही नहीं , सरकार और सरकारी अधिकारियो को न सिर्फ वोट न देने की धमकियाँ मिली थी बल्कि उनको जान से मार देने आदि की भी खुली चेतावानी दे डाली गई ..

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फिर वही हुआ जो सब जानते थे . वहां के मासूम बच्चे भी धर्मांतरण करवाने के लिए निशाने पर थे जिसके चलते ही वहां के मुसलिम संगठनों ने इस क़ानून का विरोध किया और इसे इसलाम विरोधी तक करार दिया था। कुछ समय बाद ही इस क़ानून पर सिंध के गवर्नर ने वीटो कर दिया यानी उन्होंने उस क़ानून को निष्प्रभावी कर दिया। यह एक ऐसा मामला था जिसमें सरकार और सेना को भी कट्टरपंथी ग्रुपों के सामने झुकना बड़ा। हालाँकि यह कोई नयी बात नहीं है, दूसरे मामलों में भी सरकार दर सरकार कट्टरपंथियों का ज़्यादा विरोध नहीं झेल पाती है जिसमे किसी हिन्दू या ईसाई के हित और यहाँ तक कि जीवन तक की रक्षा भी छिपी हो ..

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