विदेशनीति की विजय है ये जब अमेरिका ने भारत को वापस कर दी हजारों साल पुरानी महादेव शिव की मूर्ति जो चुराकर बेची गयी थी वहां

मोदी सरकार की विदेश नीति किस दिशा में जा रही है तथा दुनिया इसको किस तरह से ले रही है इसका शानदार नमूना एक बार पुनः देखने को मिला है जब अमेरिका भारतीय विदेश नीति के सामने नतमस्तक हुआ है. सालों पहले भारत से भगवान शिव की दो ऐतिहासिक मूर्तियां चोरी हो गई थी जिसे अब अमेरिका ने लौटा दिय है. ये मूर्तियां बहुत ही प्राचीन काल की हैं. ये मूर्तियां चोल काल की बताई जा रही हैं जिन्हें बेहद ही खास माना जा रहा है. इतना ही नहीं चुराई गई इन मूर्तियों को अमेरिका के दो संग्रहालयों में भी प्रदर्शित किया जा चुका है.

पहली मूर्ति ‘लिंगोधभवमूर्ति’ 12 वीं सदी की है. भगवान शिव की ग्रेनाइट से निर्मित यह ऐतिहासिक मूर्ति चोल काल की है. फिलहाल इसकी कीमत 225,000 डॉलर आंकी गयी है. इसे तमिलनाडु से चुराया गया था और अलबामा के बर्मिंघम संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया था. दूसरी मूर्ति बोधिसत्व ‘मंजूश्री’ की मूर्ति है. उसके हाथ में तलवार है और मूर्ति सोने के रंग में रंगी है. 12 वीं सदी की यह फिलाइट मूर्ति 1980 के दशक में बिहार में बोधगया के समीप के एक मंदिर से चुराई गयी थी. इसका वर्तमान दाम करीब 275,000 डॉलर आंका गया है. इसे उत्तरी कैरोलीना विश्वविद्यालय के आकलैंड आर्ट संग्रहालय से हासिल किया गया है. ये मूर्तियां मंगलवार को न्यूयार्क में वाणिज्य दूतावास में एक कार्यक्रम में भारत के महावाणिज्य दूत संदीप चक्रवर्ती को मैनहट्टन जिला आर्टनी साइरस वेंस जूनियर ने सौंपीं. चक्रवर्ती ने इस प्रयास की सराहना की है.

भगवान शिव की मूर्ति तमिलनाडु से चुराई गई थी जिसके बाद बर्मिंघम संग्रहालय में प्रदर्शित भी किया गया था. बोधिसत्व ‘मंजूश्री’ की दुसरी मूर्ति को को 1980 के दशक में बिहार के बोधगया के समीप के एक मंदिर से चुराया गया था. दोनों ही मूर्तियों को संग्राहलयों में प्रदर्शित किया जा चुका है और दूसरी वाली मूर्ति को नार्थ कैरोलीना यूनिवर्सिटी के आकलैंड आर्ट संग्रहालय में प्रदर्शित किया था जिसे वहीं से हासिल किया गया है. ये मूर्तियां मंगलवार को न्यूयार्क में वाणिज्य दूतावास में एक कार्यक्रम में भारत के महावाणिज्य दूत संदीप चक्रवर्ती को मैनहट्टन जिला आर्टनी साइरस वेंस जूनियर ने सौंपीं.

 

 


 

 

 

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