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सभी इस्लामिक देश आज फिर एकतरफ थे और इजराइल अकेला… एल्कीन आज फिर से जीता इजराइल और बदल गया वहां का इतिहास सदा के लिए

हमेशा से इस्लामिक जगत की आँखों की किरकरी बने इजराइल ने एक बार फिर से इजराइल में रहने मुस्लिमों तथा इस्लामिक राष्ट्रों को बड़ा झटका दिया है. पहले ही युद्ध के मैदान में कई इस्लामिक मुल्कों को पटखनी दे चुकी इजराइल के सामने एक बार फिर से वही स्थिति थी. एक तरफ से इजराइल था तो दुसरी तरफ इस्लामिक मुल्कों का दवाब, यहां तक कि खुद इजराइल के अरबी सांसद इसके खिलाफ थे लेकिन इजराइल पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा तथा ऐसा काम काम किया जिसे न सिर्फ इस्लामिक मुल्क बल्कि पूरी दुनिया देखती रह गई तथा पुनः विजेता की तरह बनकर उभरा इजराइल.

आपको बता दें कि इजराइल की संसद ने विधेयक को पारित कर दिया, जो इस देश को विशेष रूप से एक यहूदी राष्ट्र के तौर पर परिभाषित करता है. इस विधेयक के पारित होने के बाद अब अरब नागरिकों के प्रति धड़ल्ले से भेदभाव शुरू होने की आशंका जताई जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यहूदी राष्ट्र दर्जा विधेयक ने अरबी को आधिकारिक भाषा से हटा दिया और कहा कि यहूदी बस्तियों का विस्तार राष्ट्रहित में है. यह भी कहा गया कि ‘पूरा और एकजुट’ जेरूसलम इसकी राजधानी है. बता दें कि इस विधेयक का इस्लामिक मुल्क पुरजोर विरोध कर रहे थे यहां तक कि इस्राइल के अरब सांसदों ने कानून की निंदा की लेकिन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे ‘निर्धारक क्षण’ बताते हुए इस विधेयक को इजराइल के लिए जरूरी बताया तथा कहा कि इजराइल यहूदी मुल्क हिअ कर हिब्रू राष्ट्र भाषा, इस बात को स्वीकार करना ही होगा. अरब सांसदों और फिलिस्तीनियों ने इस कानून को नस्लवादी भावना से प्रेरित बताया और कहा कि संसद में हंगामेदार बहस के बाद इस विधेयक के पारित होने पर ‘रंगभेद’ वैध हो गया है. इस पर इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने विधेयक पारित होने के बाद कहा, ‘यह देश के इतिहास में एक निर्णायक पल है जिसने हमारी भाषा, हमारे राष्ट्रगान और हमारे राष्ट्र ध्वज को सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया है.’

इजराइल की दक्षिणपंथी सरकार द्वारा समर्थित विधेयक में कहा गया है, ‘इस्राइल यहूदी लोगों की ऐतिहासिक मातृभूमि है और यहां उनके पास राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का पूर्ण अधिकार है.’ विधेयक के पक्ष में 62 सांसदों ने और विपक्ष में 55 सांसदों ने वोट डाला. हालांकि, इस्राइल के राष्ट्रपति और अटॉर्नी जनरल की आपत्तियों के बाद कुछ हिस्सों को विधेयक से हटा दिया गया. इस विधेयक के पारित होने के बाद अब हिब्रू देश की राष्ट्रीय भाषा बन गई है. इससे पहले अरबी को आधिकारिक भाषा माना जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.

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