मुसलमान शरणार्थियों के मुद्दे पर बंट रहा है यूरोप.. अपनी ही सरकार से बगावत करके बोले कई मंत्री- “एक भी मुसलमान आया तो ठीक नहीं होगा”

मुस्लिम शरणार्थियों के मुद्दे पर वो यूरोप भी विभजिअत होने के कगार पर खड़ा है जसकी एकता के लिए बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं. यूरोप के ज्यादातर देश अब मुस्लिम शरणार्थियों को अपने देश में शरण देने को तैयार नहीं हैं तथा कह रहे हैं कि इनसे उनके देश की एकता अखंडता को बड़ा खतरा है. यही कारण है कि यूरोप में इस समय घमासान मचा हुआ है तथा यूरोपीय एकता की दीवारें दरक रही हैं. मुस्लिम शरणार्थियों के मुद्दे पर अब यूरोपीय संघ के अस्तित्व पर सवाल उठ रहे हैं. इन मुस्लिम शरणार्थियों के मुद्दे पर यूरोप में किस कदर घमासान मचा है इसका सबसे बड़ा उदाहरण जर्मनी है. आपको बता दें कि मुस्लिम शरणार्थियों का स्वागत करने वाली जर्मन चांसलर एंजेला मैर्केल न सिर्फ यूरोपीय संघ के स्तर पर लगातार हमले झेल रही हैं, बल्कि उनकी अपनी सरकार पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं. उनकी गठबंधन सरकार में गृह मंत्री हॉर्स्ट जेहोफर उन्हें आंख दिखा रहे हैं और जर्मनी में आने वाले शरणार्थियों की संख्या पर हर हाल में पाबंदियां लगाना चाहते हैं. जेहोफर ने कह दिया है कि अगर उनकी बात नहीं मानी गई तो उनकी पार्टी सीएसयू मैर्केल की सीडीयू पार्टी से अलग हो जाएगी जिसके बाद मर्केल सरकार का गिरना तय है. अगर सीएसयू अगर सीडीयू के साथ अपना 70 साल से ज्यादा पुराना गठबंधन तोड़ने के बारे में सोच सकती है, तो समझ लीजिए मामला कितना अहम है.

मामला केवल जर्मनी तक ही सीमित नहीं है.  जर्मनी के अलवावा पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक रिपब्लिक, ये चारों देश शरणार्थियों के मुद्दे पर झुकने को तैयार नहीं हैं. यूरोपीय संघ चाहता है कि सभी सदस्य देश शरणार्थी संकट का बोझ मिलजुल कर उठाएं. इसके लिए एक कोटा योजना के तहत सभी सदस्य देशों को निर्धारित संख्या में अपने यहां शरणार्थियों को बसाना है. लेकिन पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक रिपब्लिक को यह बिल्कुल मंजूर नहीं. इन देशों ने उस बैठक का भी बहिष्कार करने का एलान किया जो यूरोपीय आयोग के प्रमुख जाँ क्लोद युंकर और जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने आप्रवासी नीति पर चर्चा करने के लिए बुलाई है. गौरतलब है 2015 के शरणार्थी संकट के बाद से ही ये देश इस मुद्दे पर यूरोपीय संघ में बागी तेवर अपनाए हुए हैं तथा कह रहे हैं कि उन्हें मुस्लिम शरणार्थी मंजूर नहीं हैं. अब ऑस्ट्रिया भी मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ आवाज उठाने लगा है. ऑस्ट्रिया का कहना है कि यूरोपीय संघ के सदस्यों को इस बात के लिए बाध्य नहीं नहीं किया जा सकता कि वे अपने यहां शरणार्थियों बसाएं.

मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ खड़े हुए इन देशों को इटली का भी साथ मिला है, जहां पिछले दिनों धुर दक्षिणपंथी पार्टियों ने मिल कर सरकार बनाई है. इटली के नए गृह मंत्री मातेओ सालविनी शरणार्थी विरोधी तेवरों के लिए जाने जाते हैं. सालविनी चुनावों में जनता से किए गए वादे के प्रति गंभीर दिखाई देते हैं. यह वादा था इटली की धरती से एक लाख शरणार्थियों को जल्द से जल्द डिपोर्ट करना. और यह काम शुरू भी हो चुका है। पिछले हफ्ते इटली की सरकार ने एक शिप को वापस लौटा दिया जिस पर 630 लोग सवार थे. बाद में यह शिप स्पेन पहुंचा, जिसने शरणार्थियों को लेने की इजाजत दी थी. इटली में पिछले कुछ सालों में नौकाओं पर सवार होकर लगभग दर्जनों देशों के लगभग छह लाख लोग पहुंचे हैं. इनमें से कुछ लोग चकमा देकर दूसरे यूरोपीय देशों में भाग गए हैं. लेकिन ज्यादातर इटली में ही मौजूद हैं और वहीं उन्होंने शरण के लिए आवेदन दिया है. इस तरह के लगभग 1.33 लाख आवेदन पेंडिंग पड़े हैं. यूरोपीय संघ के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल इटली ने सात हजार से ज्यादा लोगों को अपने यहां से निकाला है. माना जाता है कि अभी डेढ़ लाख लोगों पर इसी तरह निष्कासन की तलवार लटक रही है तथा इटली की सरकार ने साफ़ कर दिया है कि वह एक-एक मुस्लिम शरणार्थी को बहार करेगा.

गौरतलब है कि यूरोपीय संघ जिन मानवीय मूल्यों पर टिका है, उनके तहत सीरिया, इराक या फिर अफगानिस्तान जैसे संकटग्रस्त क्षेत्रों से जान बचाकर भागे लोगों को शरणार्थी के तौर पर लेने से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन लाखों की तादाद में आ रहे इन लोगों के कारण सामाजिक और आर्थिक संसाधनों पर यूरोपीय देशों में बोझ बढ़ रहा है। उनके रहन सहन के साथ साथ उनके रोजगार का भी इंतजाम करना होगा. दूसरी चिंता यह है कि वे यूरोप के समाज में कैसे घुलेंगे मिलेंगे. कानून व्यवस्था की चुनौतियां भी बढ़ रही हैं. हाल में छोटी मोटी चोरी से लेकर यौन उत्पीड़न और हत्या जैसे गंभीर अपराधों के कई ऐसे मामले सामने आए, जिनमें शरणार्थी लिप्त पाए गए. यूरोप में लगातार मजबूत हो रही दक्षिणपंथी पार्टियां ऐसी घटनाओं को मुद्दा बना रही हैं तथा उनका कहना है कि वह अपने देश को मुस्लिम चरमपंथ का शिकार नहीं होने देंगे. यही वजह है कि आधुनिक और उदार समझे जाने वाले यूरोप में अब धुर दक्षिणपंथी पार्टियां मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बन रही हैं. इटली, ऑस्ट्रिया, हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया, नॉर्वे और फिनलैंड जैसे देशों में वे सरकार चला रही हैं तो जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड्स और स्वीडन जैसे देशों की संसद में उनकी नुमाइंदगी है. संभव है कि मुस्लिम शरणार्थियों  के मुद्दे पर यूरोपीय संघ बंट जाये लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि यूरोप तो जाग रहा है लेकिन हिंदुस्तान के तथाकथित मानवतावादी  दुर्दांत आतंकी रोहिंग्या तथा बांग्लादेशी आक्रांताओं के समर्थन में तनकर खड़े हो जाते हैं.

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