बौद्धों के खिलाफ दुनिया भर में साजिश . गया में विस्फोट की साजिश के बाद अब तिब्बत के सबसे पुराने बौद्ध मन्दिर में आग

क्या इसे मानवता की हत्या नही कही जायेगी , क्या इस पर तथाकथित मानवाधिकार खामोश रहेगा या सिर्फ मत और वर्ग विशेष देख कर ही मानवाधिकार तय किये जायेगे ? सिखों, बौद्धों और हिन्दुओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार और अपराध आखिर कब मानवाधिकार के हनन की श्रेणी में आयेंगे ? रोहिंग्या आंतकियो के लिए दहाड़े मारने वाले क्या बौद्धों के खिलाफ रची जा रही इस अन्तर्राष्ट्रीय साजिश पर खामोश रहेंगे ?

ज्ञात हो कि पहले म्यन्मार के तमाम चौकी थानों के अलावा बौद्दों के धर्मस्थलों पर हुए हमले के बाद भारत में बोध गया में उनको निशाना बनाने की गहरी साजिश रची गयी जिसको भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने सफल नहीं होने दिया और सब के सब आक्रान्ता दबोचे गये .. अब उसी दुस्साहस और नफरत की आग शायद तिब्बत तक पहुच गयी है क्योकि तिब्बत स्थित बौद्धों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक जोखांग मंदिर में बेहद रहस्यमय ढंग से भीषण आग लग गयी. इस आग के लगने के सटीक कारणों का अभी पता नहीं चल पाया है क्योकि अभी जांच आदि चल रही है लेकिन इसमें किसी आतंकी तत्व के होने से इंकार नहीं किया जा रहा है .

ज्ञात हो की राजधानी लहासा स्थित 1,300 साल से ज्यादा पुराना यह मंदिर यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों में शामिल है. सरकारी संवाद समिति शिन्हुआ की खबर के अनुसार, किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है. हालांकि खबर में मंदिर को पहुंचे नुकसान के संबंध में कोई सूचना नहीं दी गयी है.

आग शाम करीब छह बजकर चालीस मिनट पर लगी, हालांकि उसपर जल्दी ही काबू पा लिया गया. सरकारी अखबार चाइना डेली ने विस्तृत जानकारी दिये बगैर अपनी खबर में लिखा है कि दमकल कर्मियों ने आग पर काबू पा लिया है और सभी धार्मिक प्रतीक पूरी तरह से सुरक्षित हैं. विदित हो की इस्लामिक आतंकी दल तालिबान ने बामियान में बौद्धों की मूर्तियों को बारूद से ये कहते हुए उड़ा दिया था की उनके मजहब में बुतपरस्ती हराम है इसलिए वो इन प्रतीकों को अपने द्वारा शासित इलाके में नहीं रखेंगे … 

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