अगर अहमद जैसे कुछ लोग और भी निकले वहां तो जल्द ही महाशक्ति अमेरिका की नजर में भारत की भी होगी ईराक, सोमालिया और सीरिया जैसी छवि

उसको शांति का दूत बना कर और मान कर दिया गया था अमेरिका की नागरिकता . भले ही उसका नाम अहमद था लेकिन उसके साथ सबसे बड़ी बात ये जुडी थी की वो भारत से है और इसके चलते ही उसको अमेरिका की नागरिकता आसानी से मिल गयी .. लेकिन वो जिस थाली में खाया उसमे ही करता रहा छेद और आख़िरकार आ ही गया अमेरिका के रडार पर जहाँ उसको मिला उसके कुकर्मो का दंड.. भारत की छवि का फायदा उठा कर बेहद विकृत सोच और आतंकी विचारधारा वाले अहमद ने 2004 में अमेरिकी नागरिकता हासिल की थी लेकिन आख़िरकार अमेरिका की ही पीठ में घोंप दिया छुरा और भारत की साख पर भी .

अफ़सोस उसकी हरकत से अमेरिका द्वारा भारत के नाम पर किये गए विश्वास को झटका लगा और यकीनन आगे से आने वाले किसी आवेदन पर अमेरिका कई बार विचार कर सकता है .. मात्र एक गद्दार के चलते .. ज्ञात हो की डोनाल्ड ट्रम्प के कड़े शासन में अमेरिका ने आतंकवाद के दोषी पाए गए एक भारत से गए अहमद की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने को लेकर इलिनोइस जिले की एक संघीय अदालत में वाद दायर किया है। अहमद के खिलाफ दर्ज शिकायत में उस पर आरोप है कि नागरिकता हासिल करने की प्रक्रिया के दौरान उसने अपने आपराधिक आचरण के बारे में गोपनीयता बनाए रखी। खलील अहमद और उसके रिश्तेदार जुबैर अहमद ने 2004 से 2007 के बीच विदेश यात्रा की तैयारियां की और उन गतिविधियों में लिप्त होने के इरादों के साथ मिस्र का दौरा भी किया। इससे अमेरिकी सुरक्षा बलों के कर्मियों की हत्या की जा सके या उन्हें अपंग किया जा सके। 

अहमद ने 2009 में इराक या अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य बलों को निशाना बनाने के मकसद से विदेश जाने के अपने प्रयासों के जरिए आतंकवादियों को मदद मुहैया कराने के आरोपों को स्वीकार किया था। उसे 2010 में आठ साल और चार महीने की कैद की सजा सुनाई गई थी और सजा पूरी होने पर रिहाई के बाद भी उस पर तीन साल तक नजर रखने को कहा गया था।कार्यवाहक एसोसिएट अटॉर्नी जनरल जेसी पानुसियो ने अहमद की नागरिकता वापस लिए जाने के लिए इलिनोइस की एक संघीय अदालत में वाद दर्ज कराने के बाद कहा है कि नागरिकता रद्द करना हमारे आतंकवाद रोधी प्रयासों का एक महत्त्वपूर्ण कदम है। 

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