संयुक्त राष्ट्र ने रूस से कहा कि इस्लामिक मुल्क सीरिया में रोको बमबारी .. क्या रूस मान गया या हुआ कुछ और ??

इतना तो तय है कि जब भी इतिहास में इस्लामिक आतंक से सबसे मजबूती से लड़ने वाले विदेशियों की चर्चा होगी तो उसमे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का नाम कहीं न कहीं जरूर आएगा .. सीरिया में मचे घमासान के बाद जब आतंकियों ने घुटने टेक दिए और रूस से बमबारी बन्द कर के संघर्ष विराम की गुहार संयुक्त राष्ट्र संघ से लगाई तो संयुक्त राष्ट्र ने रूस को आदेश दिया हमले रोकने का ..लेकिन रूस जानता था कि ये सब बिखर रहे आतंकियों की चाल है इसलिए उसने एक न सुनी और जारी रखे हैं अपनी भीषण बमबारी ..

रूस समर्थित सीरिया सरकार व विरोधी गुटों के बीच चल रहे भीषण संघर्ष के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सीरिया में 30 दिवसीय संघर्ष विराम का प्रस्ताव पास किया है। हालांकि ये प्रस्ताव महज एक लॉलीपॉप साबित हुआ है क्योंकि प्रस्ताव पास होने के कुछ समय बाद ही विद्रोहियों पर पुनः बमबारी हो रही है।

विदित हो कि पिछले काफी समय से सीरिया में सेना व सरकार के विरोधी गुट के बीच भयंकर संघर्ष चल रहा । विद्रोही गुट राष्ट्रपति असद को हटाने की मांग को लेकर अपने देश की सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए है। पिछले एक हफ्ते में ही सीरियाई सरकार की सेना व विद्रोही के गुटों के बीच हुए संघर्ष में 500 से अधिक मौत हो चुकी है.. यूएन में इस पर गंभीर चर्चा हूई व संघर्ष विराम के लिए प्रस्ताव लाया गया जिसे सर्व सम्मति से पास कर दिया गया। हालांकि सुरक्षा परिषद का सबसे अहम व मजबूत सदस्य रूस इस प्रस्ताव में कुछ संशोधन चाहता था लेकिन रूस के प्रस्ताव खारिज कर दिए गए, रूस का कहना था कि इस समय सीरिया में संघर्ष विराम सम्भव न होगा।
कुछ देशों के राजनयिकों ने आरोप लगाया कि रूस सिर्फ समय की बर्बादी कर रहा है। ज्ञात हो कि रूस सीरिया की असद सरकार के समर्थन में विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्यवाही का समर्थन करता है व उससे जुड़े भी है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेसे ने कहा कि सीरिया के पूर्वी गूता में स्थिति नरक जैसी हो गयी है व वहां संघर्ष विराम तत्काल प्रभाव से जरूरी हो गया है। जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र की 15 सदस्यीय परिषद ने शनिवार को सीरिया के युद्ध प्रभावित इलाके में सहायता पहुंचाने, मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराने व तुरंत संघर्ष विराम के पक्ष में वोट किया। हालांकि इस प्रस्ताव का कुछ असर पड़ता हुआ दिखाई न दे रहा है क्योंकि इसके बाद भी विद्रोहियों पर बमबारी जारी है।

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