जिस मजार पर हुआ बच्चे से कुकर्म वो अभी भी मौजूद है रेलवे स्टेशन के सरकारी परिसर में..पर किस के आदेश पर ये अब तक नहीं बताया गया

ये सिर्फ अकेले रायबरेली स्टेशन की घटना नहीं है .. ऐसी कई मजारें न सिर्फ बाराबंकी के स्टेशन पर बनी है बल्कि शायद ही भारत का कोई भी ऐसा बड़ा और प्रसिद्ध रेलवे स्टेशन हो जिस की सरकारी जमीनों पर मजार न बन गयी हो . इलाहाबाद , लखनऊ और न जाने कहाँ कहाँ . अभी हाल में ही सुदर्शन न्यूज ने छत्तीसगढ़ के रेलवे स्टेशन पर हुसैन के नाम से प्याऊ पर सवाल उठाया तब कई मजहबी विचारधारा, तथाकथित सेकुलर व् बुद्धिजीवी वर्ग ने उसका विरोध किया था लेकिन अचानक ही बाराबंकी में जो कुछ भी हुआ उसके बाद वही वर्ग अब इस मामले में खामोश है जिसमे स्वघोषित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत प्रमुख कारण बन चुके हैं .

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में इंसानियत को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है. मजार पर रहने वाले एक मुजावर ने किशोर को अपनी हवस का शिकार बना डाल. पीड़ित किशोर ने रेलवे पुलिस से मुजावर की शिकायत की. आनन-फानन में पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर किशोर को मेडिकल के लिए भेज दिया है. इस मामले में सबसे खास पहलू ये है कि अब तक ये सामने नहीं आ पाया है कि वो मजार किस के आदेश पर और कब बन गयी . वर्तमान समय में स्टाफ के रूप में मौजूद शायद ही किसी स्टाफ को पता हो कि ये मजार कितनी पुरानी है और किस के आदेश पर एक साथ इतने बड़े रूप में कैसे बन गयी है ?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बाराबंकी में हुए इस मामले में बाराबंकी के जिला अस्पताल के डॉक्टर एस के सिंह ने बताया कि लड़के को लेकर जीआरपी के लोग आए थे. जिसका चिकित्सीय परीक्षण उनके द्वारा किया गया है. ऐसे मामले में नमूने भेजने पड़ते है जो संग्रहीत कर लिए गए हैं. जीआरपी ने जो कागज उनके पास भेजे थे उसमें पास्को एक्ट लगा हुआ था. सवाल ये है कि रेलवे स्टेशन जैसे अतिमहत्वपूर्ण स्थलों पर इस प्रकार के उन निर्माणों को कब तक संरक्षित रखा जाएगा जिसका कोई भी उदाहरण , कारण और इतिहास किसी के पास भी नहीं है . एक रेलवे स्टेशन पर बिना टिकट किसी को घूमने देखने पर फ़ौरन ही जुर्माना लगाने वाले नियम वहां २४ घंटे मुफ्त में रहने वाले ऐसे मुज़वारों के खिलाफ लागू क्यों नहीं होते ..

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