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रोहिंग्या के लिए तत्काल न्याय मांग रही पार्टी ने 40 साल तक रोक कर रखा था उस फ़ौजी की दाल रोटी भी जिसने अपना सब कुछ लुटा दिया था देश पर

एक सैनिक का जीवन आम आदमी के जीवन से काफी भिन्न होता है.वह अपने देश के लिए मर-मिटने को सदैव तैयार रहता है.जब हम अपने घरों में सो रहे होते हैं, तब वह सीमा पर दुश्मनों का सामना कर रहा होता है.युद्ध के क्षेत्र में भी सैनिक कभी पीठ नहीं दिखाता.वह सदैव दुश्मनों पर हावी रहता है.हर सैनिक की जिन्दगी में एक दीवानापन होता है.उनकी सांस का भरोसा नहीं, कब मौत आ जाए कोई भरोसा नहीं होता.देश-प्रेम का भाव तो हमारे देश में प्रत्येक नागरिक के भीतर है, परंतु हमारे सैनिक पर देश-प्रेम एक नशे की तरह छाया रहता है.

जब वह किसी नगर में दंगों के कारण फैली अशांति को शांति में परिवर्तित करते हैं, तभी उनके मन में संतोष पैदा होता है.सैनिक न केवल युद्ध के केवल युद्ध के मैदान में बल्कि देश पर आने वाली अन्य विपदाओं जैसे-बाढ, भूकम्प, तूफान, दुर्घटना आदि में भी मदद करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं.सैनिकों में देश-प्रेम इतना अधिक होता है कि वह अपने परिवार को छोड कर देश के लिए वर्षो तक देश की सीमा पर रहता है.उसके लिए ठंड या गर्मी कोई महत्व नहीं रखती.

वह सदैव देश के लिए कुछ-ना-कुछ करते रहने को तैयार रहता है. एक मामला मोहाली का जहाँ चालीस साल पहले सिक्किम बार्डर पर ड्यूटी के दौरान हुए माइन ब्लास्ट में दिव्यांग हुए पूर्व सैनिक चित्तर सिंह को सेना ने वार कैजुल्टी मान लिया है.भारतीय सेना के जवान को 40 साल धक्के खाने के बाद इंसाफ मिला तो उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े. वहीं, यह लाभ जब से वह घायल हुए हैं, तब से मिलेगा.यह मामला सर्विस मैन ग्रीवांस सेल पंजाब के प्रमुख कर्नल एसएस सोही की तरफ से उठाया गया था.उन्होंने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी, उसके बाद यह परिणाम सामने आया है.जानकारी के मुताबिक, चित्तर सिंह उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में स्थित गांव मौधा के रहने वाले हैं.वह चालीस साल पहले बार्डर पर माइन ब्लास्ट के दौरान दिव्यांग हो गए थे.

वह चलने फिरने में असमर्थ हो गए थे.उन्होंने अपनी टांगें खो दी थी और उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई थी. अब वह गरीबी में अपना जीवन गुजार रहे हैं. इसी बीच यह मामला एक्स सर्विस मैन ग्रीवांस सेल के ध्यान में आया. 2013 में संस्था की तरफ से आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल में केस लगाया गया.इसका फैसला चित्तर सिंह के पक्ष में आया. इस दौरान कोर्ट ने चित्तर सिंह को युद्ध विकलांग माना गया. साथ ही तीस हजार रुपये वेतन देने के आदेश दिए.फरवरी 2017 में फैसला आने के बाद भी रक्षा मंत्रालय द्वारा इसे लागू नहीं किया गया.वहीं, अमर उजाला में दो सितंबर 2017 के अंक में ‘वर्षों बाद मिला सैनिक को इंसाफ, लेकिन सरकार नहीं ले रही सुध’शीर्षक से पूर्व फौजी का दर्द छापा था.

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