भारत में हुआ करते थे नवाब.. भाग कर चले गए पाकिस्तान और हो गए रोटी रोटी के मोहताज

जूनागढ एक नगर, भारत के गुजरात प्रान्त में एक नगर पालिका एवं जनपद मुख्यालय है। यह शहर गिरनार पहाड़ियों के निचले हिस्से पर स्थित है। मंदिरों की भूमि जूनागढ़ गिरनार हिल की गोद में बसा हुआ है। यह मुस्लिम शासक बाबी नवाब के राज्य जूनागढ़ की राजधानी था। गुजराती भाषा में जूनागढ़ का अर्थ होता है प्राचीन किला। इस पर कई वंशों ने शासन किया। यहां समय-समय पर हिंदू, बौद्ध, जैन और मुस्लिम, इनका प्रभाव रहा है।

विभिन्न राजनीतिक और धार्मिक शाक्तियों के समन्वय के कारण जूनागढ़ बहुमूल्य संस्कृति का धनी रहा है। बंटवारे के बाद जब सरदार वल्लभ भाई पटेल 500 से ज्यादा रियासतों का विलय कर रहे थे. तब सभी शासकों ने एक से बढ़कर एक परेशानियां पैदा कीं. पटेल भी लोहे के बने थे, उनके आगे रियासतों को झुकना ही पड़ा. विलय की शर्त माननी पड़ी. हालांकि कुछ शासकों के मंसूबे कुछ और ही थे. जिन्ना बरगलाने में लगे थे और जूनागढ़ के नवाब पाकिस्तान में विलय में किसी भी हाल में आमादा थे. जबकि उसके राज्य की बहुसंख्यक हिन्दू जनता भारत में विलय के पक्ष में थी.

जूनागढ़ के नवाब ने क्या कुछ नहीं किया लेकिन जब सारी चालें उल्टी पड़ने लगीं तो वह खुद पाकिस्तान भाग गए. जूनागढ़ के ये नवाब थे महाबत खान. आज पाकिस्तान में उन नवाब के परिवार की हालत खराब है. उन्हें गुजारे के तौर पर महीने का जो पैसा मिलता है, वो चपरासी के वेतन से भी कम होता है. केवल 16 हजार रुपए. अब जूनागढ़ के परिवार के लोग खासे बेचैन हैं. हालत वैसी है कि न तो खुदा मिला और न ही बिसाले सनम. रह रहकर वो पाकिस्तान में मीडिया को बताने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान के लिए उन्होंने कितनी बड़ी कुर्बानी दी है और ये मुल्क उन्हें किनारे कर चुका है. उनका हाल तक जानना नहीं चाहता.

कोशिश तो वह जूनागढ़ के भारत में विलय के मामले को विवादास्पद बनाने की भी करते हैं. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. वह दावा करते हैं कि जूनागढ़ का मामला अब तक संयुक्त राष्ट्र में सुलझा नहीं है, हालांकि स्थिति इसके ठीक उलट है. पाकिस्तान के कराची शहर में नवाब महाबत खान के जो तीसरे वंशज रह रहे हैं, उनका नाम है नवाब मुहम्मद जहांगीर खान. कुछ समय पहले उन्होंने पाकिस्तान में कहा कि अगर उन्हें पता होता कि पाकिस्तान जाने के बाद उनका मान सम्मान खत्म हो जाएगा तो वे कभी भारत छोड़कर नहीं आते. अब नवाब के परिवार का हाल ये है कि मौजूदा पाकिस्तान सरकार उन्हें अन्य राज परिवारों के समान न तो मान-सम्मान देती है औऱ न किसी गिनती में गिनती है.

खटास इस बात की भी है कि अपने जिस वजीर के उकसावे में आकर वो पाकिस्तान से भागे, उस वजीर भुट्टो का परिवार पाकिस्तान का मुख्य राजनीतिक परिवार बन गया. वैसे जूनागढ़ के भारत में विलय का मामला भी कोई कम चर्चित नहीं रहा है. जूनागढ़ की 80 आबादी के इस विलय पर जो रायशुमारी हुई थी, उसमें 80 फीसदी जनता भारत के साथ जाने को तैयार थी. पाकिस्तान निरुत्तर हो गया. 25 सितंबर को जूनागढ़ मुक्त करा लिया गया.

पुस्तक सरदार लेटर्स के अनुसार, बंबई में उस दिन स्वतंत्र जूनागढ़ की अस्थाई सरकार गठित की गई. वीपी मेनन की पुस्तक इंटीग्रेशन आफ इंडिया इनस्टेड के अनुसार, हालात और दबाव के आगे भुट्टो टूटते जा रहे थे. पाकिस्तान की ओर से कोई खास पहल होती नहीं दिख रही थी. इन्हीं सब परिस्थितियों के बीच 09 नवंबर को भारतीय फौजें जूनागढ़ में प्रवेश कर गईं और उन्हें जूनागढ़ पर कब्जा कर लिया. इस तरह जूनागढ़ आजाद हो गया. हालांकि, पुख्ता मुहर 20 फरवरी 1948 को लगी, जब वहां भारत सरकार ने जनमत संग्रह कराया था. कुल 2,01, 457 वोटरों में 1,90,870 ने वोट डाले. जबकि पाकिस्तान के पक्ष में केवल 91 ही वोट पड़े.

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