लव जिहाद के विरोध को प्यार का विरोध बताने वाला कथित बुद्धिजीवी वर्ग खामोश था मेघालय में ईसाईयों से जुडी इस बड़ी घटना पर. हिन्दूराष्ट्र का बयान देने वाले जस्टिस सेन ने फिर किया न्याय

आस्था की रक्षा करते गौ रक्षक और अपने धर्म में गुमराह हुई लडकियों को सही राह दिखाते हिन्दू संगठनो के लोग आये दिन तथाकथित बुद्धिजीवियों के निशाने पर रहे हैं . एक पूरा वर्ग उनको केवल भगवा पहनने के चलते , जय श्री राम बोलने के कारण अपने निशाने पर लिए रहता है और उनको साम्प्रदायिक शक्तियों के नाम से पुकारा करता है . लेकिन मेघालय की एक घटना ने एक बार फिर से सवाल खड़ा होने पर मजबूर कर दिया है कि जब मामला हिन्दू समाज के बाहर का होता है तो उनके वो तमाम बड़े बड़े सलाह और बातें कहाँ चली जाया करती हैं . ज्ञात हो कि मेघालय की एक घटना ने फिर से ध्यान खींचा है सबका .

विदित हो कि ईसाइयों के ही २ मतों के बीच में उलझे विवाद को जहाँ हिन्दुओ की हर खबर पर नजर गडाए मीडिया के एक वर्ग ने जहाँ दबाने की कोशिश की तो वहीँ बुद्धिजीवियों ने उस पर खामोश साधे रखी थी . यद्दपि इस मामले में वही जस्टिस सेन ही काम आये थे जिनकी अक्षरशः हिन्दुओ पर की गयी टिपण्णी को कुछ लोगों द्वारा विवाद का विषय बनाया गया था . उनके ही एक महत्वपूर्व फैसले ने फिर से एक अन्याय के शिकार व्यक्ति को न्याय दिया है . जस्टिस सेन ने उस शख्स की नियुक्ति बहाल करने का आदेश दिया जिसे चर्च के एक अन्य सम्प्रदाय में शादी करने की वजह से नौकरी से निकाल दिया था। ईसाई के एक मत के मानने वाले दासुक्लांग खरजाना 2015 से मेघालय के किंशी प्रेस्बिटेरियन अपर प्राइमरी स्कूल में असिस्टेंट टीचर के पद पर थे।

इस साल, जुलाई में मौखिक आदेशों के बाद उनकी सेवा अचानक रोक दी गई। आश्चर्यजनक रूप से सरकार ने तमाम नियम कानून और धर्मनिरपेक्षता के नियमो को ताख पर रखते हुए इसके पीछे वजह यह थी कि प्रेस्बिटेरियन समुदाय से आने वाले खरजाना ने एक कैथलिक से शादी की थी। उसके बाद खरजाना ने स्कूल के कई चक्कर काटे यह जानने के लिए उन्हें नौकरी से हटाने की वजह आखिर उनकी शादी कैसे हो गई। स्कूल प्रशासन की तरफ से कोई साफ जवाब न मिलने की वजह से खरजाना ने मेघालय हाई कोर्ट का दौरा किया। गुरुवार को, जस्टिस एसआर सेन की सिंगल बेंच ने इस मामले पर नाराजगी जाहिर करते हुए खरजाना को दोबारा नियुक्त किए जाने का आदेश दिया। साथ ही खरजाना के बकाए के लिए 50 हजार रुपये मुआवजे के रूप में देने के लिए कहा। एक बार फिर से न्याय करते हुए जस्टिस सेन ने अपने आदेश में कहा, ‘शुरुआत में मैंने पूरे मामले में अपनी नाराजगी जाहिर की थी। कोई भी अथॉरिटी अंतरजातीय या फिर अलग संप्रदाय में हुई शादी को नहीं रोक सकता है। यह पूरी तरह से दो लोगों का व्यक्तिगत मामला है। इसका उनकी नौकरी से कोई लेना-देना नहीं है।

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