मुसलमानों के लिए बाबा आंबेडकर के शब्दों को भुला दिया आज के तथाकथित दलित नेताओं ने.. जानिये क्या कहा था उन्होंने


देश का माहौल इस समय कमलेश तिवारी की क्रूरतम ह्त्या के बाद गरमाया हुआ है. इस्लामिक पैगंबर मोहम्मद को लेकर कमलेश तिवारी द्वारा की गई एक टिप्पणी के बाद मजहबी चरमपंथियों ने घर में घुसकर कमलेश तिवारी का गला रेत दिया. इसके बाद से देश के लोग भड़के हुए हैं तथा कमलेश तिवारी की ह्त्या को देश में शरीयत की शुरूआत मान रहे हैं. कमलेश तिवारी की ह्त्या के मामले में अब तक जितने भी नाम सामने आये हैं या गिरफ्तार हुए हैं वो सभी एक ही समुदाय(इस्लाम) से हैं.

जिस तरह पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी को लेकर भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में कमलेश तिवारी की ह्त्या की गई, तो क्या इसे ये माना जा सकता है कि जिन लोगों ने कमलेश तिवारी की जान ली है वो देश के संविधान नहीं बल्कि अपनी मजहबी कुरआन के प्रति समर्पित हैं? क्या इन लोगों के लिए देश का संविधान, देश का क़ानून आदि कुछ मायने नहीं रखता ? क्या मुस्लिम वर्ग की सोच वास्तव में ही ऐसी है ? ये वो सारे सवाल हैं जो हम सबके जेहन में तैर रहे हैं. इसका कारण यही है कि जिस तरह कमलेश तिवारी का क़त्ल किया गया, वो एक लोकतांत्रिक देश में सभ्य उदाहरण पेश नहीं करता बल्कि ऐसा तो सीरिया, लीबिया आदि कट्टरपंथी इस्लामिक मुल्कों में होता है.

इन सारे प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के विचारों को जानना चाहिए. आंबेडकर ने इस्लाम को लेकर क्या कहा था, ये जानना ज़रूरी है. एक मीडिया वेबसाइट में बताया गया था कि बाबा साहेबी आंबेडकर ने इस बात से नाराज़गी जताई थी कि लोग हिन्दू धर्म को विभाजन करने वाला मानते हैं और इस्लाम को एक साथ बाँध कर रखने वाला. आंबेडकर के अनुसार, यह एक अर्ध-सत्य है. उन्होंने कहा था कि इस्लाम जैसे बाँधता है, वह लोगों को उतनी ही कठोरता से विभाजित भी करता है. आंबेडकर मानते थे कि इस्लाम मुस्लिमों और अन्य धर्म के लोगों बीच के अंतर को वास्तविक मानता है और अलग तरीके से प्रदर्शित करता है.

बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम जिस भाईचारे को बढ़ावा देता है, वह एक वैश्विक या सार्वभौमिक भाईचारा नहीं है. बाबासाहब ने कहा था कि

“इस्लाम में जिस भाईचारे की बात की गई है, वो केवल मुस्लिमों का मुस्लिमों के साथ भाईचारा है. इस्लामिक बिरादरी जिस भाईचारे की बात करता है, वो उसके भीतर तक ही सीमित है. जो भी इस बिरादरी से बाहर का है, उसके लिए इस्लाम में कुछ नहीं है- सिवाय अपमान और दुश्मनी के. इस्लाम के अंदर एक अन्य खामी ये है कि ये सामाजिक स्वशासन की ऐसी प्रणाली है, जो स्थानीय स्वशासन को छाँट कर चलता है. एक मुस्लिम कभी भी अपने उस वतन के प्रति वफादार नहीं रहता, जहाँ उसका निवास-स्थान है, बल्कि उसकी आस्था उसके मज़हब से रहती है. मुस्लिम ‘जहाँ मेरे साथ सबकुछ अच्छा है, वो मेरा देश है’ वाली अवधारणा पर विश्वास करें, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता.”

इसके बाद बाबासाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने जो बातें कही हैं, वो सोचने लायक है और आज भी प्रासंगिक है. बाबासाहब ने कहा था कि इस्लाम कभी भी किसी भी मुसलमान को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि भारत उसकी मातृभमि है. बाबासाहब के अनुसार, इस्लाम कभी भी अपने अनुयायियों को यह स्वीकार नहीं करने देगा कि हिन्दू उनके स्वजन हैं, उनके साथी हैं. पाकिस्तान और विभाजन पर अपनी राय रखते हुए बहसाहब ने ये बातें कही थीं. आंबेडकर की इन बातों पर आज ख़ुद को उनका अनुयायी मानने वाले भी चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये उनके राजनीतिक हितों को साधने का काम नहीं करेगा. अपना धर्म बदलने की घोषणा करने वाली मायावती भी इस बारे में कुछ नहीं बोलतीं.

आंबेडकर मानते थे कि मुस्लिमों की आस्था, चाहे वो आम नागरिक हो या कोई फौजी, केवल क़ुरान पर ही निर्भर रहेगी आंबेडकर के अनुसार, मुस्लिम भले ही ख़ुद के शासन में रह रहें हो या फिर किसी और के, वो क़ुरान से ही निर्देशित होंगे. आंबेडकर ने तभी यह मान लिया था कि भारत कभी भी ‘हिन्दुओं और मुस्लिमों के बराबर हक़ वाला’ देश नहीं बन सकता. बाबासाहब का साफ़ मानना था कि भारत मुस्लिमों की भूमि बन सकती है, लेकिन हिन्दुओं और मुस्लिमों, दोनों का एक कॉमन राष्ट्र नहीं बन सकता. क्या आज के नेतागण और सामाजिक कार्यकर्ता बाबासाहब के इन कथनों पर चर्चा के लिए तैयार हैं? या फिर सेलेक्टिव चीजें ही चलेंगी?

आंबेडकर जी कहते थे कि कोई भी मुस्लिम उसी क्षेत्र को अपना देश मानेगा, जहाँ इस्लाम का राज़ चलता हो. इस्लाम में जातिवाद और दासता की बात करते हुए आंबेडकर ने कहा था कि सभी लोगों का मानना था कि ये चीजें ग़लत हैं और क़ानूनन दासता को ग़लत माना गया, लेकिन जब ये कुरीति अस्तित्व में थीं, तब इसे सबसे ज्यादा समर्थन इस्लामिक मुल्कों से ही मिला. उन्होंने माना था कि दास प्रथा भले ही चली गई हो लेकिन मुस्लिमों में जातिवाद अभी भी है. आंबेडकर का ये बयान उनलोगों को काफ़ी नागवार गुजर सकता है, जो कहते हैं कि हिन्दू समाज में कुरीतियाँ हैं, जबकि मुस्लिम समाज इन सबसे अलग है. आंबेडकर का साफ़-साफ़ मानना था कि जितनी भी सामाजिक कुरीतियाँ हिन्दू धर्म में हैं, मुस्लिम उनसे अछूते नहीं हैं. ये चीजें उनमें भी हैं.

बाबासाहब आंबेडकर आगे कहते हैं कि हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं. मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर आंबेडकर ने कड़ा प्रहार करते हुए इसकी आलोचना की थी. उन्होंने पूछा था कि ये अनिवार्य क्यों है? जाहिर है, उनका इशारा बुर्का और हिजाब जैसी चीजों को लेकर था. इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं. आंबेडकर में इतनी हिम्मत थे कि वो खुलेआम ऐसी चीजों को ललकार सकें. उनका मानना था कि दलितों को धर्मांतरण कर के मुस्लिम मजहब नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि इससे मुस्लिम प्रभुत्व का ख़तरा वास्तविक हो जाएगा.

उस समय मुस्लिम कोंस्टीटूएंसी की बात करते हुए बाबासाहब आंबेडकर का कहना था कि वहाँ मुस्लिमों को इससे कोई मतलब नहीं रहता कि उनका उम्मीदवार जीतने के बाद क्या करेगा? आंबेडकर कहते हैं, मुस्लिमों को बस इस बात से मतलब रहता है कि मस्जिद का लैंप बदल दिया जाए, क्योंकि पुराना वाला ख़राब हो गया है. मस्जिद की चादर नई लाइ जाए, क्योंकि पहले वाल फट गया है और मस्जिद की मरम्मत कराई जाए, क्योंकि वो जीर्ण हो चुका है. आंबेडकर को मुस्लिमों के इस सिद्धांत से आपत्ति थी कि जहाँ भी स्थानीय नियम-क़ायदों और इस्लामिक क़ानून के बीच टकराव की स्थिति आए, वहाँ इस्लाम अपने क़ानून को सर्वोपरि मानता है और स्थानीय नियम-क़ायदों को धता बताता है.


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