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अंग्रेजो को मार भगाने वाला वो चरखा कहीं दिखे तो बताना,, उस बार्डर पर रखना है जहाँ हमारे जवान बलि चढ़ रहे – सुरेश चव्हाणके

बचपन से सुनते आए थे कि दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल ..असल मे पहले सोचने की क्षमता बाल मन मे नहीं होती है पर जब जैसे जैसे बड़ा हुआ तो इस विषय पर शोध करने लगा कि आखिर उस चरखे में क्या दम रहा होगा जिसे देख कर दुनिया पर राज करने वाले अंग्रेज भाग गए .. पर जब गहन अध्ययन किया तो मुझे कहीं से नहीं लगा कि अंग्रेज चरखे से भागे रहे होंगे क्योंकि चरखे से आप के घर मे जबरन घुसा एक किरायेदार निकालना मुश्किल है , वो तो किसी को देश से निकालने का संघर्ष था …

फिर आगे  चल कर किशोरावस्था में कईयों से तर्क वितर्क किया तो कईयों ने माना कि हां , चरखे से किसी को भगाना सम्भव नहीं पर कईयों ने बचपन वाले गाने पर पूरी आस्था जताई और कहा कि हां , चरखे से ही अंग्रेज भागे थे .. ये बड़ी असमंजस वाली स्थिति थी मेरे लिए ..पर चरखे के समर्थकों में मुझे रटने वाली विद्द्या की पारंगतता दिखी .. यहाँ तक कि मैंने कई बार खुद चरखा चलाया पर तब भी शांति स्थापित करने में सफलता नहीं मिली ..

फिर मैंने देखा कि सीमा पर और देश के अंदर सुकमा जैसे स्थानों पर आये दिन जवान वीरगति पा रहे हैं .. मैने कई चरखा समर्थकों को मात्र सैनिकों के परिजनों के रुदन की पीड़ा को महसूस करते हुए अपने हाथों से चरखे खरीद कर दिए और हाथ जोड़ कर निवेदन किये कि आप इसे चला कर जवानों को बचा लो , मैने उन्हें वो चरखा बचपन से चरखे को ले कर जोड़ी गयी पूरी आस्था व श्रद्धा के साथ इसी उम्मीद से भेंट किया था कि अब हमारे जवान बलिदान नहीं होंगे ..

असल मे ये सोच इसलिए भी थी क्योंकि मुझे लगता था कि छोटे बाबू से ले कर मुख्यमंत्री , प्रधानमंत्री तक आज़ादी का श्रेय चरखे को देते हैं , तो यक़ीनन वो सारे के सारे झूठ नहीं बोलते रहे होंगे ..पर जब मात्र और मात्र अपने जवानों की विधवाओं के चीत्कार को सुन कर द्रवित हो कर मैने चरखा समर्थकों को चरखे भेंट करते हुए उसे चला कर जवानों को बचाने की बात की तो वो ना जाने क्यों पीछे हटने लगे ..

जिस प्रकार वो ये नहीं बता सके थे कि चरखे से कोई भाग कैसे सकता है उसी प्रकार वो ये नहीं बता सके कि वो चरखा क्यों नही लेंगे जबकि उसकी सख्त जरूरत थी कश्मीर से सुकमा तक ..कुछ ने अपना अंतिम अस्त्र फेंक कर बताया कि ये वो वाला चरखा नहीं है ….

तब से ले कर आज तक मैं उस चरखे की तलाश में हूँ जिसके आने के बाद भारत को ना पृथ्वी मिसाइल , ना अग्नि मिसाइल  , ना पोखरण का परमाणु व ना ही रूस के सुखोई की जरूरत पड़ेगी …

मैं दे दी हमें आज़ादी वाले गाने को पूरी श्रद्धा से सुन रहे उन सभी भाईयो से उस दिव्य चरखे की तलाश में मेरा साथ  देने का आह्वान व निवेदन करता हूँ जिसे उस बॉर्डर पर रखते ही किसी हेमराज का दुबारा सर नहीं काटा जाएगा , उस चरखे को तलाशने में मदद करें मेरी जिसको सीमा पर रख कर फिर किसी लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया की आंखे नहीं फोड़ी जाएगी …

मैं राष्ट्र हित में आप सब भाईयों बहनों से उस दिव्य व चमत्कारी चरखे की तलाश में आप सब से सहयोग मांगता हूं जिस के बारे में हमें रटाया गया था कि उसी ने दुष्ट अंग्रेजों को मार कर भगाया था…..

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