उपराष्ट्रपति चुनाव के पहले ही घुटने टेक रहे हैं गांधी के वंसज….

केंद्र में जैसे विपक्ष चारो खाने चित होकर अगले चुनाव को लेकर डरी सहमी है वैसे ही विपक्ष द्वारा समर्थित उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार चुनाव के परिणाम के आने से पहले ही डरे सहमे है। चुनाव में विपक्ष की 18 पार्टियों की ओर से उम्मीदवार बनाए गए पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी क्या नतीजा आने से पहले ही हार मान चुके हैं? गांधी के बातो से कुछ इसी तरह का संकेत मिलता है। महात्मा गांधी के पौत्र गोपालकृष्ण गांधी ने अख़बार को दिए साक्षात्कार में कहा है कि देश को एक अच्छे उपराष्ट्रपति की जरूरत है। इसीलिए वहां मेरे होने की ज़रूरत नहीं है। 
उनसे सवाल किया गया था कि क्या वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि सत्ताधारी एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का उम्मीदवार घोषित होते ही उन्हें समर्थन देने वाले दलों में से कुछ पाला बदल सकते हैं? इस पर उन्होंने उल्टा सवाल कर दिया कि अगर एनडीए के उम्मीदवार ऐसे हों जो देश को प्रेरित कर सकें और सर्वसम्मति के अधिकारी हों तो उन्हें समर्थन क्यों नहीं देना चाहिए? गोपालकृष्ण गांधी से यह भी पूछा गया कि अगर वे चुन लिए जाते हैं तो उपराष्ट्रपति के तौर पर उनकी भूमिका कैसी होगी? 
इसके ज़वाब में उन्होंने कहा कि ठीक वैसी ही जैसी सर्वपल्ली राधाकृष्णन या अन्य पूर्ववर्ती उपराष्ट्रपतियों की रही है। भरोसे, धैर्य और निष्पक्षता का झंडाबरदार। ग़ौरतलब है कि उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य पांच अगस्त को वोट डालेंगें। उसी दिन शाम तक नतीजे़ की घोषणा भी हो जाएगी। जहां तक संसद के दोनों सदनों के संयुक्त संख्या बल का मसला है तो उसमें एनडीए का पलड़ा भारी नज़र आ रहा है। 
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