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हिन्दू एकता के कारण कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने घुटने टेके ..वापस लिया देवताओं को चुनौती देता एक हिंदूद्रोही फैसला

गुजरात मे हिन्दू वोटो के लिए राहुल गांधी व अन्य कांग्रेसी भले ही मन्दिर जा कर दर्शन कर रहे हों लेकिन कर्नाटक में उन्ही मंदिरों को वही कांग्रेस अपने सरकारी कब्जे में लेना चाहती थी जिस से ईश्वर की भक्ति करने वाले वहां के पुजारी आदि उनके मुख्यमंत्री की आराधना करें क्योंकि वो जिसे चाहेगा वही वहां पुजारी आदि पद पर रहेगा ..

ज्ञात हो कि मंदिर में मांस खा कर जाने वाले कर्नाटक के मुख्यमंत्री व सोनिया और राहुल के बेहद करीबी कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को आखिर में हिन्दू एकता के आगे घुटने टेकने ही पड़े और इसी के चलते आखिरकार कर्नाटक सरकार मठों पर अपने प्रस्तावित कदम से पीछे हटी.. भारतीय जनता पार्टी और आध्यात्मिक प्रमुखों की आलोचना के बीच कर्नाटक की सिद्धरमैया नीत कांग्रेस सरकार मठों और मंदिरों तथा उसके द्वारा संचालित अन्य धार्मिक संस्थानों को धार्मिक धर्मादा अधिनियम के दायरे में लाने के अपने प्रस्तावित कदम से आज पीछे हट गई.

मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने राज्य विधानपरिषद में बताया, सरकार की किसी भी मंदिर, मठ या धार्मिक संस्थान को अधिनियम के दायरे में लाने की इस तरह की कोई सोच नहीं है. हम उन चीजों को देखेंगे जो र्संबद्धी विभाग के अधीन है, हमें दूसरों का बोझ क्यों लेना चाहिए. यह अतिरिक्त भार है. भाजपा ने सरकार के इस प्रस्तावित कदम को ‘हिन्दू विरोधी नीति’ बताया था और चुनौती दी थी कि सरकार मस्जिदों, दरगाहों और गिरिजाघरों को अपने अधीन करे. कई संतों ने भी इस कदम का कड़ा विरोध किया था.

पेजावर मठ के विश्वेशा तीर्थ स्वामी ने कहा कि यदि सरकार इसका अधिग्रहण करती है तो वह मठ छोड़ देंगे. उन्होंने कहा था, मैं सरकार का नौकर नहीं बनना चाहता हूं. इस मामले पर भाजपा द्वारा उठाये गये एक सवाल के जवाब में सिद्धरमैया ने कहा कि इस तरह की कोई सोच नहीं है. यह गलत सूचना है कि सरकार ऐसा कुछ करने जा रही है. यद्द्पि इस फैसले के बाद सरकार की भारी किरकिरी हुई है और कई हिंदुओं के कत्ल के लिए कटघरे में खड़ी कर्नाटक सरकार के लिए अब हिंदुओं को जोड़ पाना और मुश्किल हो गया है क्योंकि ये उनके आराध्य देवों व उनके देवस्थलों से जुड़ा मामला था ..

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