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JNU के लिए पुणे पुलिस की रिपोर्ट पढ़कर रोंगटे खड़े हो जायेंगे हर किसी के.. वही हो रहा जो आपने सोचा रहा होगा

भीमा कोरेगांव हिंसा में जैसी आशंकाएं जताई जा रही थीं वो अब बिलकुल सत्य साबित होती नजर आ रही हैं. भीमा कोरेगांव हिंसा के नक्सली कनेक्शन निकलने के आबाद ही कहा जा रहा था कि कहीं न कहीं इसका संबंध JNU से भी हो सकता है. भीमा-कोरेगांव हिंसा में गिरफ्तारी के बाद ये आशंका भी सच साबित हुई है तथा इस घटनाक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) कनेक्शन भी सामने आया है. आपको बता दें कि बृहस्पतिवार को इस मामले में गिरफ्तार पांचों आरोपियों की कोर्ट में पेशी हुई जहां सरकारी वकील ने दावा किया कि यह मामला संगठित गिरोह से संबंधित है, इसलिए आरोपियों की हिरासत अवधि 14 दिनों तक बढ़ाई जाए.

गौरतलब है कि भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पुणे पुलिस ने बीते छह जून को दिल्ली, मुंबई और नागपुर से पांच लोगों को गिरफ्तार किया था जिनकी रिमांड अवधि 14 जून को समाप्त हो रही थी. इसलिए पुलिस रिमांड बढ़ाने के लिए पांचों को कोर्ट में पेश किया गया था. सरकारी वकील ने दलील दी कि पकड़े गए आरोपियों का सीधा संबंध प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से है. यह संगठित अपराध की तरह काम कर रहा है. जिला सत्र अदालत के न्यायाधीश के सामने सरकारी वकील ने सात दिन की कस्टडी के तफ्तीश का ब्यौरा देते हुए बताया कि दिल्ली से गिरफ्तार किये गए रोना विल्सन के घर से कुछ पत्र बरामद हुए थे. इससे पता चला कि दिल्ली जवाहरलाल विश्वविद्यालय में छात्रों को बहकाने के मकसद से मारे गए नक्सलवादी नवीन बाबू की याद में लेक्चर सीरीज शुरू करने वाले थे. इस लेक्चर सीरीज के दौरान भड़काऊ पत्र बांटने की योजना थी.

विशेष सरकारी वकील उज्वला पवार ने अदालत को बताया के रोना विल्सन के घर से अस्सी हजार रुपये नगद बरामद किये गए थे. रोना विल्सन ने इन 80 हजार रुपयों का हिसाब देने में बिलकुल सहयोग नहीं किया. अदालत को दो गुप्त पत्र पढ़ने को दिए जिससे, ये साबित करने का प्रयास किया गया कि तफ्तीश सही दिशा में जा रही है. आरोपी रोना विल्सन के घर से रिकवर किया गया 25 टेरा बाइट डेटा और FSL फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी से ही 25 टेरा बाइट डेटा की सीडी बनाई है. सरकारी वकील ने बताया कि यलगार परिषद तो सिर्फ दिखाने के लिए थी, इसके पीछे एक बड़ी साजिश रची गयी थी.

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