ये है वो चेहरा जिसके कारण सुलग रहा है महाराष्ट्र और इसके पीछे समर्थन था जिहादी दल PFI का ..पूरी साजिश का भंडाफोड़ सिर्फ सुदर्शन पर

महाराष्ट्र के भीमा कोरी गाँव (पुणे) में अचानक ही हुई हलचल से दिल्ली तक शोर मचने लगा ..आखिर एक साथ पूरा देश एक विरोधी स्वर में जब बोलने लगे और मीडिया का एक विशेष वर्ग दलित और हिन्दू अलग अलग कहने लगे तो इतना तो तय है कि गहन जांच की जरूरत होती है क्योंकि मामला प्रायोजित होने की संभावनाएं अचानक ही बढ़ जाती हैं ..जब सुदर्शन न्यूज़ ने की इसकी गहन पड़ताल तो इसके जड़ में मिला 2 अलग अलग स्थानों का क्षोभ , रोष और बदले की भावना , जिसमे दो लक्ष्य साधने की कुत्सित भावना निकल कर सामने आई …पहली भावना थी गुजरात मे मिली जातिवाद की हार का बदला लेना और दूसरी तीन तलाक के मुद्दे पर सरकार के आगे एक न चलने के चलते बदले की भावना ..

इन दोनों भावनाओं में से एक को पूरा करने का जिम्मा मिला जिग्नेश को और दूसरा जिम्मा उठाया मौलाना अब्दुल हमीद अजहरी ने जो पदाधिकारी है आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ..पहले की खीझ थी गुजरात चुनावों में हार की तो दूसरे को रोष था हर कोशिश के बाद तीन तलाक मुद्दे पर हार का .. एक के निशाने पर था संगठित हिन्दू समाज तो दूसरे के लक्ष्य पर थी सरकार ..अंग्रेजों की महार बटालियन और पेशवाओं के बीच महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में हुए युद्ध के 200 साल पूर्ण होने के उपलक्ष पर कल पुणे में दलित रैली का आयोजन हुआ जिसका नाम था ‘एल्गार परिषद्’.
इस रैली में प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद, राधिका वेमुला, सोनी सोरी, विनय रतन सिंह (भीम आर्मी,उoप्रo), मौलाना अब्दुल हामिद अज़हरी (राष्ट्रीय सचिव, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) आदि लोग आये थे.
कुछ 20-25 संघठनों के नामों की एक लिस्ट पढ़ी गयी जिन्होंने इस रैली का समर्थन किया. उनमे –
1) पोपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI)
2) मूल निवासी मुस्लिम मंच
3) छत्रपति शिवाजी मुस्लिम ब्रिगेड
4) दलित ऐलम (ऐलम तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है देश)
ऐसे अनेक संदेहजनक संगठनों के नाम सुनने को मिले.PFI वही जिहादी दल है जिसके हाथ हिन्दुओ के रक्त से सने हैं और इसके कई सदस्य दुर्दान्त इस्लामिक आतंकी दल ISIS के सम्पर्क में भी पाए गए जो निश्चित तौर पर NIA के रडार पर है ..इसके साथियों और कई जेहादियों को NIA ने जेल भेज दिया जिसके चलते इसके मन मे भी सरकार के प्रति विद्वेष की जबरदस्त भावना भरी थी जो आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पदाधिकारी के साथ आने से और मजबूती पा गयी …
पूरी सोच समझी साजिश के चलते और पहले से ही बनी स्क्रिप्ट के तहत रैली की शुरुआत ही दलितों पे अत्याचारों की दास्तान से शुरू हुई. एक नैरेटिव बनाया गया की आज भी दलितों पे अत्याचार होते है और ये अत्याचार करने वाले भाजपा-आरएसएस के लोग है. उनके मुताबिक भाजपा और संघ के लोग ही आज के नए पेशवा है और इनका वही हाल किया जाना चाहिए जो महार बटालियन ने 200 साल पहले पेशवाओं का किया. कहने को तो वो बार बार भाजपा, संघ, मनुवादी और ब्राम्हणों को ताने मार रहे थे, लेकिन उनकी भाषा शैली से जाना की उनका टारगेट पूरा हिन्दू समाज है.
स्टेज पर 4 मटके एक के ऊपर एक रखे थे. क्रम से उनपर लिखा था- ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र.रैली का उदघाटन राधिका वेमुला के हाथों हुआ और उद्घाटन का तरीका था हिन्दू समाज को जाति व्यवस्था के नाम पर कोसना और फिर उन चारो मटकों को फोड़ना.रैली में सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर स्ट्रीट प्ले, ग्रुप सोंग और हिप हॉप रैप सोंग का भी आयोजन था.
स्ट्रीट प्ले में वही घिसापिटा दलित अत्याचार दिखाया और एक भगवा धोती पहने ब्राम्हण दिखाया जिसे नाटक के अंत में एक दलित बच्चा मार डालता है.(अपने कथन में भीम आर्मी के विनय रतन सिंग ने कहा की इस नाटक को देखने के बाद उसका मन हुआ की भीमा-कोरेगांव दोबारा दोहराया जाए) रैली में यदि किसी हिन्दू का सम्मानपूर्वक नाम लिया गया तो केवल शिवाजी महाराज थे,(यह उनकी मज़बूरी है क्यूंकि उन्हें पता है की महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज का अपमान करना बहुत महंगा पड़ेगा) और अफ़ज़ल गुरु के भक्तों से शिवाजी महाराज का आत्मा से सम्मान करने की कल्पना भी नही की जा सकती ।।
राधिका वेमुला, उमर खालिद और जिग्नेश मेवानी का भाषण सुना. सभा का मैदान पूरा भरा हुआ था. लोगो में बहुत उत्साह देखने को मिल रहा था.जब जब हिन्दू एकता तोड़ने वाले तमाम बातों पर तालियां बज रही थी तब ये देख कर उन्हें लगता था कि वो सफल हो रहे हैं अपने कुत्सित प्रयासों में ..
जिग्नेश मेवानी का भाषण तो बेहद जहरीला था. खुद को वो ऐसे रूप में साबित करवाना चाहता था कि वहां मौजूद लोग ये समझें की दलित समाज को ऐसे ही नेताओं की जरुरत है. उमर खालिद को दलित-मुस्लिम दोस्ती के लिए लाया गया था. उसका काम था दलितों को समझाना की मुसलमान भी दलितों की तरह सताए गए है और उन्हें बदनाम किया जाता है. दलितों और मुस्लिमों का कॉमन दुश्मन भाजपा और संघ है. बीच बीच में प्रकाश आंबेडकर भी माइक हाथ में लेकर अपनी आक्रामकता दिखा रहे थे ।।
रैप सोंग गाने वालों में एक गायक मुस्लिम था. उसने ‘लव जिहाद’ के ऊपर एक रैप सोंग गाना शुरू किया..कुल मिला कर इस रैली में ये सब देखने को मिला-
1) दलित समाज को हिन्दुओं के खिलाफ बांटने और  एकजुट करने की कोशिश करते हुए समझाया गया कि वो हिन्दू नहीं हैं .. 
2) ये बताने व जताने की कोशिश होती रही कि जिहादी तत्व और कम्युनिस्ट मिलकर दलितों की मदद हिन्दू संगठनों, संघ व भाजपा से कर रहे है
3) झूठी और नकली दलित अत्याचार की कहानियां बता कर उन्हें गुमराह करने के तमाम प्रयास किये गए ..
4 ) पूरे भाषण में क्रूर , लुटेरे , हत्यारे , आताताई मुगलों का गुणगान होता रहा जो कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उस पदाधिकारी अजहरी के निर्देश पर चलता रहा जो तीन तलाक बिल पास होने के प्रतिशोध में धधक रहा था … हालात तो ये थे कि बाबा भीमराव अंबेडकर द्वारा सुझाये मूल सिद्धांतों की चर्चा तक ठीक से नही की गई और कार्यक्रम हिन्दू विरोध व हिन्दू विभाजन तक ही सीमित रखा गया .
इस प्रकार लोगों के वहा से जाने के बाद इन्ही तत्वों द्वारा अराजकता का वो ताना बाना बुना गया जिसमें निशाने पर हिन्दू , हिन्दुस्थान , एकता व राष्ट्र की अखण्डता रही .. सत्ता को इसकी गहराई से जा कर जांच जरूर करवानी चाहिए लेकिन क्या अदालत में मिली हार का बदला शांति से अपनी रोजी रोटी में व्यस्त समाज से लेना और  रक्तपात करवा कर अराजकता फैला कर हंगामा करवा कर लेना अजहरी जैसे मज़हबी ठेकेदारों को किसी भी हाल में शोभा देता है ? कभी साध्वी प्रज्ञा के मोबाइल में आई मिस कॉल वाले को भी पूछताछ के लिए उठाने वाली पुलिस क्या अब इतना बड़ा राष्ट्रीय स्तर का हंगामा करवाने वालों के ख़िलाफ़ वैसी ही कड़ी कार्यवाही करेगी ? 

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