पार हुई देशद्रोह की सभी सीमाएं. रोहिंग्या हत्यारों को मासूम और BSF को अपराधी बताया गया भारत की अदालत में

क्या इसे भी बड़ी कोई और राष्ट्रविरोधी घटना हो सकती है ? क्या भारत की फौज उनके लिए कम और रोहिंग्या उनके लिए इतने जरूरी हो गये है ? भारत की जांबाज़ BSF तक को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है बौद्धों के हत्यारों को भारत में बसाने के लिए . इसके अगुवा वो है हैं जो अदालत के बाहर आ कर कहते हैं कि उनसे देशभक्ति का सबूत न माँगा जाय क्योकि वो प्रबल राष्ट्रवादी हैं . 

विदित हो कि एक बार फिर से उच्चतम न्यायलय में एक याचिका दाखिल हुई है जिसमे भारत की BSF को अमानवीय और अपराधी के रूप में दिखा कर रोहिंग्या को बेहद मासूम और अच्छे इंसानों के रूप में दिखाया गया है . हैरानी की बात ये रही कि इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय ने भी गंभीरता दिखाई है और गुरुवार को केन्द्र से दो रोहिंग्या शरणार्थियों की नई याचिका पर जवाब मांगा जिसमें आरोप लगाया गया कि बीएसएफ शरणार्थियों को भारत में प्रवेश से रोकने के लिए हथगोलों का प्रयोग कर रहा है.

इन दोनों रोहिंग्याओं में इतना साहस आ चुका है कि उन्होने भारत की BSF को कटघरे में खड़ा कर दिया है . अक्सर कहा जाता है कि इनके पास पैसे आदि नहीं है खाने के फिर भी इन्होने न जाने कहाँ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका आदि दाखिल कर दी वो भी भारत की सरकार और BSF को प्रतिद्वंदी बता कर . ये याचिका सुनने वाले थे प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा जिनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने केन्द्र को दो रोहिंग्या शरणार्थियों के अंतरिम आवेदन पर चार हफ्ते में जवाब देने को कहा.

हैरानी की बात ये है कि इस याचिका में कहा गया है कि भारत का सीमा सुरक्षा बल भारत में रोहिंग्याओं को घुसने नहीं दे रहा है . इसके साथ उन्होंने ये भी कहा कि BSF सीमा पर जमा रोहिंग्या को भगाने के लिए गोलियां भी चला रही है . अदालत ने भारत की आन मान और शान BSF के खिलाफ सुनवाई की अगली तारीख भी मुकर्रर कर डाली और  संक्षिप्त सुनवाई के दौरान, मोहम्मद सलीमुल्ला और मोहम्मद शाकिर की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि बीएसएफ असहाय शरणार्थियों को ‘अमानवीय और निंदनीय तरीके से’ वापस भेज रहा है. प्रशांत भूषण इस से पहले भी भारत के तमाम देशद्रोही कहे जा सकने वाले बयानों और कार्यों में संलिप्त रहे हैं . इस घटना से पूरे देश में रोष व्याप्त है और इसको देशद्रोह की अंतिम सीमा कहा जा रहा है . 

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