जानिये क्या है शरिया लॉ एक्ट 1937 ? जिसका हवाला देते हुए तमाम मौलाना कहते हैं कि उनके मामलों में दखल ना दे सरकार ..

भारत में मुस्लिम
पर्सनल लॉ अक्सर एक विवादित रूप में चर्चा में रहता है। अब ये कुछ समय पहले
काशीपुर की शयरा बानो द्वारा कोर्ट में तीन तलाक को चुनौती दिए जाने के बाद एक बार
फिर चर्चा में आया है। भारत में अलग-अलग समाज के लोग रहते है। भारतीय सविधान के
अनुच्छेद
14 के अनुसार भारत में रहने
वाले सभी लोगों को एक समान संरक्षण का अधिकार है
, लेकिन जहाँ मुसलमानों के व्यक्तिगत मुद्दों की बात आती है
वहाँ कई अहम मुद्दों पर मुसलमान शारिया के अनुसार उन मुद्दों का निकारण करते हैं।
ये मुद्दे है निकाह
, तलाक, विरासत, बच्चों का उत्तराधिकार आदि। अधिकतर शारिया या शारियत सुनने
व पड़ने में आता है
, आखिर ये है क्या,
और कब से ये लागू हुआ ?

 

इस्लामिक समाज
शरीयत के अनुसार चलता है। 
शरीयत में
मोहम्मद पैगंबर द्वारा किए हुए काम के शब्द शामिल है। मोहम्मद पैगंबर के बाद कई
संस्थाओं ने अपने अनुसार इस्लामिक कानूनों की व्याख्या की और इन्हें प्रसारित व्
प्रचारित किया। इस्लामिक लॉ की चार संस्था है जो कुरान में लिखें शब्दों की
व्याख्या करती है। ये संस्थाएं है हनफिय्या
, मलिकिय्या, शफिय्या और
हनबलिय्या है
, जो अलग-अलग सदी
में विकसित हुई थी। मुस्लिम देश अपने अपने मुताबिक इन संस्थाओं के कानूनों का पालन
करते है।  

 

सबसे बड़ी बात है
कि ये शरीयत आखिर भारत में कैसे आया
? भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट ब्रिटिशों की देन है। ब्रिटिश
सरकार का भारतीयों पर जब राज करना मुश्किल होने लगा तब ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों
पर उनके सांस्कृतिक नियमों के अधार पर राज करने की प्रक्रिया निकाली। ब्रिटिश
सरकार ने मुसलमानों के व्यक्गित मुद्दे पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
उन्होंने मुसलमानों के व्यक्तिगत मुद्दों के लिए
1937 मुस्लिम लॉ एक्ट लाकर उन्हें उनके व्यक्तिगत मुद्दों पर
उठे विवादों को शरीयत के अनुसार ही सुलझाने की छूट दे दी।

 

ब्रिटिश सरकार ने
1937 मुस्लिम लॉ एक्ट लाकर जो
विभाजन करवाने का कार्य किया वैसा ही कार्य कुछ पूर्ववर्ती सरकारों ने किया । सन्
1985 में एक 62 वर्ष की मुस्लिम महिला शाह बानो ने सुप्रीम कोर्ट में एक
याचिका दाखिल की जिसमें उसने अपने पूर्व पति से गुजारे भत्ते की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस मांग से सहमत होकर इस मुद्दे को सही बताया और अपनी मुहर
लगाई। इस फैसले का मुस्लिम समाज में काफी विरोध देखने को दिखा व इसे कुरान के
खिलाफ बताया। इस मामले ने काफी तूल पकड़ लिया था। तब तत्कालीन  प्रधानमन्त्री  ने वोट बैंक के लालच में ऐसा फैसला लिया जिससे
देश आज भी प्रभावित है। तत्कालीन प्रधानमन्त्री  राजीव गांधी ने मुस्लिम महिला संरक्षण तलाक
अधिकार अधिनियम को पास कर दिया। जिसके अनुसार पति के लिए तलाकशुदा पत्नी को गुजारा
भत्ता देना तो जरूरी हो गया था लेकिन साथ ही ये प्रावधान भी था कि यह भत्ता केवल
इद्दत की अवधि के दौरान ही देना होगा। इद्दत तलाक के
90 दिनों बाद तक ही होती है ।

 

उपरोक्त कानून की
पूरी विवेचना आदि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के लिए आवश्यक है जिस
से सामान नागरिक आचार संहिता का पालन हो कर सबके लिए समान क़ानून बन सके . फिलहाल ३
तलाक के विषय में ३ तलाक के तमाम समर्थक शरीयत एक्ट पर चल कर ३ तलाक को कायम रखने
की मांग कर रहे हैं .    

 

 

 

 

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