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रुको इन्हें सुरक्षित घर छोड़ आऊँ, फिर हमें पत्थर मार लेना- *(फ़ौज या फ़रिश्ते)*

पहले अपनी ढाल से ढक दिया उस फूल सी मासूम को, 
फिर खुद के शरीर की दीवाल बना दी उस डरी सहमी माँ के चारों तरफ ,
फिर सैकड़ों पत्थर पड़े उनके फौलाद जैसे जिस्मों पर ,
लेकिन उफ़ तक न की ,
पर उस मासूम और उसकी माँ तक पत्थर क्या हवा भी ना आने दी .

और उस नन्ही मासूम को उसके घर तक पूरी तरह सुरक्षित छोड़ कर वापस अपनी ड्यूटी पर आ गए , किसी और की जान बचाने के लिए , अपनी जान दाँव पर लगा कर.

वो दोनों देवियां कोई बाहरी नहीं बल्कि उन्ही पत्थरबाजों में से किसी एक के घर की थीं ..
भले ही हजारों हाथों में पत्थर ले कर उम्र भर सेना के खिलाफ नारे लगाएं पर ये मासूम और वो ममतामयी माँ जीवन भर याद रखेगी कि वो जवान नहीं भगवान थे.

इनके खिलाफ खड़े लोगों , शर्म को भी तुम पर शर्म आती होगी ।

जय हिन्द की सेना 

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