हिन्दुओं का एक सेकुलर संत मुहर्रम में मनाता है मातम और बहाता है अपना खून.. बाकी सबको कहता है ऐसा ही करने के लिए


जहाँ एक तरफ मुस्लिम समाज के तमाम लोग अयोध्या में श्रीराम का मंदिर न बनने देने की बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट में न सिर्फ प्रभु श्रीराम बल्कि अयोध्या , रामायण और महाभारत के साथ साथ अखाड़ो तक के पौराणिक इतिहास पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो वहीं इसको भूल कर हिन्दू समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो भगवा वस्त्र पहनने और खुद के नाम में स्वामी आदि लगाने के बाद भी धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बने हुए हैं . हद की बात ये है कि इनके जैसे कई के होने के बाद भी हिन्दू समाज पर असहिष्णुता का आरोप लगता है .

हिन्दू समाज में खुद को स्वामी कहलाने वाले और मुस्लिमो के मुहर्रम में जा कर मातम मनाने के साथ खुद को चोटिल तक करने वाले इन तथाकथित सेकुलर संत का नाम है स्वामी सारंग . इनकी कभी भी मुखर आवाज अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मन्दिर के लिए भले ही न सुनाई दी हो लेकिन ये मुस्लिमों के बीच अच्छे खासे लोकप्रिय हैं . इनका अधिकतर कार्यक्षेत्र लखनऊ और आस पास के जिले रहे हैं और भगवा वस्त्र पहन कर ये लगभग हर साल मातम मनाने के लिए मुस्लिमों के बीच दिखाई देते हैं .

इस से पहले स्वामी लिखने वाले ओम , स्वामी ही लिखने वाले अग्निवेश जैसो की काफी चर्चा रही है . अब एक अन्य चर्चित नाम आया है स्वामी लिखने वाले सारंग का.. गत वर्ष भी ये कथित स्वामी लखनऊ में दसवीं मुहर्रम पर माथे पर तिलक लगाए खूनी मातम करते हुए दिखाई दिए थे . उनकी शिद्दत देख कर लग ही नहीं रहा था कि वो एक हिन्दू और वो भी संत वेश में हैं . वे शियाओ के गुरु कल्बे जव्वाद के साथ मातम के जुलूस में चल रहे थे .

उन्होंने मुहर्रम गमे हुसैन में अपनी पीठ पर कमां और जंजीर जानी (मातम के समय उपयोग होने वाले चेन से बंधे चाकू) चलाए थे .. इसके साथ ही उन्होंने अपनी ही तरह बाकी अन्य सभी धर्म के लोगों से इन मातम के आयोजनों में शरीक होने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि वे इमाम हुसैन की शहादत के गम में अपना खून इसलिए बहाने आए हैं क्योंकि हुसैन ने मानवता के लिए अपना जीवन समर्पित किया था। स्वामी सारंग इससे पहले भी मुहर्रम के जुलूसों में शामिल होते रहे हैं।

इनके मूल परिचय के बारे में बताया जाता है कि तीर्थराज प्रयागराज में जन्मे और वर्तमान में लगभग 46 साल के हो चुके सारंग की प्राथमिक शिक्षा राजस्थान में हुई थी .. इसके बाद वे 20 वर्ष लखनऊ में रहे और इमाम हुसैन से इतने ज्यादा प्रभावित हो गये थे कि उन्होंने बाकायदा काफी समय तक इमाम हुसैन पर अध्ययन कर डाला था .. इसके बाद वे लखनऊ में ही बस गए और विवाह किया, उनकी दो बेटियां हैं और वे खुद को हिन्दुओं का आध्यात्मिक गुरु कहते हैं . उनके कई अनुयायी भी हैं जो उन्ही की राह पर चलते हैं .


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