संभल के बलिदानियों का अंतिम संस्कार थोडा रुक कर करना साहब.. बॉर्डर स्कीम लगाई है आपने, बलिदानियों के घर वालों को आने में देर लगेगी

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में अपराधियों के हमले में पुलिस के 2 जांबाज़ सिपाही वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं.. उनके पास भले ही लम्बी सी बंदूक थी लेकिन उस बंदूक की नली के बराबर भी अधिकार नहीं थे वरना शायद अपराधी की हिम्मत नहीं होती उन्हें ऐसे ही मार के चलते जाने की वो भी चलते वाहन में जब 2 अन्य स्टाफ आगे बैठे हों.. किसी ने पक्का बताया होगा उन अपराधियों को कि निचले पायदान पर तैनात इन पुलिस वालों को कितने अधिकार मिले हुए हैं..

निश्चित तौर पर उन अपराधियों ने प्रयागराज कचेहरी काण्ड के पीड़ित सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह की जानकारी ली रही होगी जो खुद को बचाने के चक्कर में गोली चलाने का दोषी मान लिया गया और आज लगातार चौथा साल है उसको जेल में तिल तिल कर मरते हुए .. या तो वो उसी समय उसी कचेहरी में ही नबी अहमद के हाथो मारा जाता तो शायद ऐसी दुर्गति नहीं हुई होगी .. अगर तुलना की जाय संभल में बलिदान हुए सिपाहियों और सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र की पुलिस की मजबूरी आराम से समझी जा सकती है .

कल्पना कीजिए अगर कहानी इसकी उलटी होती तो क्या होता .. अगर उस समय पुलिस वाले उन हिंसक हो चुके कैदियों से खुद को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे होते और उनकी गोली से आत्मरक्षा में ही 3 कैदी मारे गये होते तो उनकी बात पर आज कौन विश्वास करता ? मानवाधिकार और मीडिया तो बहुत दूर की बात है , क्या उनके वो अधिकारी ही विश्वास करते जो उन बलिदानियों की लाशो को लोडर में डाल कर खानापूर्ति करते हुए देखे गये हैं .

भले ही आज वो हाँ कह दें लेकिन उनका सच रायबरेली जेल में 4 साल से बंद है जिसमे सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह कैमरे में अकेले एक भीड़ से जूझते देखा गया है और उसको उस नबी अहमद के नेतृत्व में घेर रखा गया था जिस नबी अहमद के ऊपर आधे दर्जन से ज्यादा मामले  दर्ज थे.. कहना गलत नही होगा कि संभल में बलिदान हुए सिपाहियों को अपने प्राण दे कर प्रमाण देना पड़ा है वर्ना शायद उनके भी हालत सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह जैसे होते ..

सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के हालात में सबसे दर्दनाक बात ये है कि जिस प्रकार से वो जेल में तिल तिल कर मर रहा है, उसी प्रकार से उनकी पत्नी और बच्चे अपने घर में घुट घुट कर जी रहे हैं . अगर IPS अजय पाल शर्मा ने इस बार शैलेन्द्र सिंह की बेटियों की फीस जमा न की होती तो शायद अब तक बच्चियों की पढ़ाई बंद हो चुकी होती और जेल में लाचार पिता सिर्फ दीवारों के अंदर चीखने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकता था .. लेकिन काश IPS अजय पाल शर्मा जैसा दिल उनमे भी होता जिन्होंने संभल में बलिदान का सम्मान नहीं किया .

यहाँ एक निवेदन और है प्रदेश के मुखिया से और पुलिस के भी मुखिया से .. वो बलिदान हुए सिपाहियों के अंतिम संस्कार में तेजी नहीं दिखाएँगे क्योकि जिस हिसाब से वहां के पुलिस अधीक्षक यमुना प्रसाद ने उनके पार्थिव शव लोडर से मंगाने में तेजी दिखाई, उस से ऐसा लग रहा है कि अगर उनका बस चलता तो वो आनन फानन में अंतिम संस्कार भी करवा देते .. बलिदान हुए ये सभी पुलिसकर्मी सरकार के लगाये नियम बार्डर स्कीम के अंर्तगत आते थे ..

इसके चलते उनके परिवार वालों को शायद पहुचने में देर लगे .. वो कई जिला दूर हैं और अगर बदहवास हो कर भी भागेंगे तो भी काफी समय लग जाएगा उन्हें अपनों की पार्थिव देह तक पहुचने में. बरसात का मौसम है , रास्ते में जाम भी मिल सकता है . उन्हें ये भी देखना होगा कि उन्हें बस जल्दी पहुचायेगी या ट्रेन .. वो सिपाही थे , इतने बड़े अधिकारी नही कि उनके घरो में 4 पहिया वाहन तेल डाल कर खड़े हों और स्टार्ट कर के फ़ौरन पहुच गये.. उनमे से कुछ परिवार वालों को शायद शवो को उतना दूर सम्मान से ले जाने के लिए पैसों का इंतजाम भी करना पड़े .. .

ये शव वो कई जिला पार करवा कर ले भी जायेंगे जिसका पूरा जिम्मा वो खुद उठाएंगे क्योकि वो उनके अपने की देह है और वो उसको लोडर में नहीं रख सकते हैं.. पिछली सरकार द्वारा लागू की गई बार्डर स्कीम पर पुनर्विचार करने के लिए तमाम बार आवेदन हुए हैं लेकिन शायद यही एक मुद्दा है जिस पर वर्तमान सरकार पिछली सरकार से सहमत है.. अंत में परमात्मा इन बलिदानियों के परिवार वालों को ये पहाड़ जैसा कष्ट सहने की शक्ति दे और वीर बलिदानियों की आत्मा को शांति भी ….

 

रिपोर्ट-

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज  

मुख्यालय – नॉएडा 

मोबाईल – 9598805228

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