कभी हाईकोर्ट ने दिया था मस्जिद हटाने का फैसला तो ये बोला था सुप्रीम कोर्ट जो आज श्रीराम के मंदिर पर दे रहा कड़े फैसले

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या श्रीराम मंदिर मामले पर तारीख दे दी. 2010 में हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद अयोध्या श्रीराम मंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट गया था तथा 8 सालों से आज तक तंबू में बैठे रामलला को मिली है तारीख और सिर्फ तारीख. ऐसे कई मौके आये हैं जब कई टालने वाले मौकों पर माननीय कोर्ट ने तत्परता दिखाई है लेकिन अयोध्या श्रीराम मंदिर मामले में मिली है तारीख और सिर्फ तारीख. कहा जा रहा था कि 29 अक्टूबर से जब सुनवाई शुरू होगी तो उसके बाद हर दिन सुनवाई होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इस बार भी मिली तो सिर्फ तारीख. हालाँकि इस बार तो तारीख भी नहीं मिली है बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगली सुनवाई जनवरी में होगी तथा तारीख भेई जनवरी में ही बताई जायेगी.

हम आपको एक ऐसा मामला बताने जा रहे हैं जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था लोगों की आस्थाओं का सम्मान किया जाना चाहिए..वह मामला एक मस्जिद से जुड़ा हुआ था लेकिन जब बात हिन्दू आस्थाओं की आती है तो वहां पर माननीय न्यायालय का बदला बदला सा नजर आता है. हम यहाँ सुप्रीम कोर्ट पर सवाल खड़े नहीं कर रहे हैं बल्कि दो मामलों की तुलना कर रहे हैं तथा तुलना करने पर ये प्रश्न जेहन में आता ही है. बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट(प्रयागराज) परिसर में एक मस्जिद बनी हुई थी. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए नवंबर 2017 में हाईकोर्ट ने तीन महीने के भीतर मस्जिद को वहां से हटाने का आदेश दिया था. कोर्ट ने कहा कहा कि यह जमीन हाईकोर्ट की है. मस्जिद का निर्माण अवैध अतिक्रमण है, इसलिए मस्जिद तीन महीने के भीतर वहां से हटाई जाए.

हाईकोर्ट के बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट गया. सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से मस्जिद हटाने की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी. तर्क दिया गया था कि मस्जिद के हटने से मुस्लिम समाज की भावनाएं आहत होंगी. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से कहा कि दोनों पक्षकार आपस में बातचीत से मामले को सुलझा लें. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार से कहा था कि वह वह मस्जिद बनाने के लिए वैकल्पिक जमीन देने के बारे में बताए. इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में वो अवैध मस्जिद आज तक बनी हुई है क्योंकि उसके हटने से मुस्लिमों की भावनाएं  आहत होंगी लेकिन अयोध्या मामले पर हिन्दुओं की भावनाएं चाहे आहत हों, चाहे कुचली जाएँ, चाहे रौंदी जाएँ..लगता है माननीय सुप्रीम कोर्ट को कोई फर्क नहीं पड़ता है.

राष्ट्रवादी पत्रकारिता को समर्थन देने हेतु हमे आर्थिक सहयोग करे. DONATE NOW पर क्लिक करे
DONATE NOW