समाज सैल्यूट कर रहा इंस्पेक्टर अली को, जो बकरीद पर बकरा काटने के बजाय गरीबों को देते हैं दान

कल 12 अगस्त को बकरीद पर देशभर में मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा निरीह जानवरों को काटा गया, उनकी कुर्बानी दी गई, खून बहाया गया. बकरीद के लिए पहले से ही मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कुर्बानी के लिए जानवरों को खरीदना शुरू कर दिया था. कई जगहों से ऐसी भी ख़बरें आईं जहाँ बकरों की कीमत हजारों में नहीं बल्कि लाखों में आंकी गई, यहां तक कि एक बकरे की कीमत 2.5 करोड़ आंकी गई. इसके बाद कल बकरीद पर सिर्फ बकरे ही नहीं बल्कि अन्य जानवर भी काटे गये.

लेकिन हम यहाँ बात करने जा रहे हैं एक ऐसे व्यक्ति की जो मुस्लिम होने के बाद भी बेजुबान जानवरों को नहीं काटता है बल्कि उसकी जगह गरीबों की, जरूरतमंदों की आर्थिक मदद करता है. बकरीद पर जानवरों को काटने के बजाय गरीबों की मदद करने वाले इस व्यक्ति का नाम है  बकरीदन अली अली जो वाराणसी में सीबीसीआईडी में इन्स्पेक्टर हैं. बकरीदन अली पिछले 8 से 10 वर्षों से कुर्बानी के लिए बकरा खरीदने का पैसा (ज़कात) गरीबों को दे देते हैं. वह कहते हैं कि रूढ़िवादी विचारों से आजाद होना जरूरी है.

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के रहने वाले बकरीदन अली का कहना है कि ऑफिस में एक दिन बैठा हुआ था तभी जेहन में आया कि बकरीद के दिन हम बकरा खरीदकर कुर्बानी देने की बजाए अगर सीधा यह रकम गरीब लोगों की मदद में लगा दें तो ज्यादा बेहतर हो. इस बारे में मैंने अपने समुदाय के लोगों से बातचीत भी की. मैंने सोचा कि क्यों न हम बकरे की कुर्बानी की जगह सीधा इसकी रकम ही गरीब लोगों को दें. कई बार हमारे द्वारा दी गई रकम से गरीबों के रुके हुए काम पूरे हो जाते हैं, उनके चेहरे पर खुशी आ जाती है. यही सब सोचकर मैं पिछले 8-10 वर्षों से ऐसा कर रहा हूँ.

बकरीदन अली का कहना है कि लोग कहते हैं सुन्नत है, वगैरह…वगैरह लेकिन मैं इन रूढ़िवादी विचारों से बाहर निकल गया हूँ. मैंने कहा कि जिसको जो सोचना है वह सोचता रहे. तकरीबन साढ़े 39 वर्ष बकरीदन अली की नौकरी को पूरे हो चुके हैं. वह कहते हैं कि रूढ़िवादिता से निकलकर अगर लोग सोचें तो बहुत कुछ हो सकता है. उनका मानना है कि लोगों की मदद करके अलग दुआएं मिलती हैं. भई सभी लोग यह पुण्य के लिए ही तो करते हैं. बस इस रास्ते में मेरा तरीका अलग है. सीबीसीआईडी में इन्स्पेक्टर बकरीदन अली कहते हैं कि कई बार तो गोश्त फ्रिज में रखा हुआ सड़ जाता है. बाद में इसे दफनाया जाता है. इस तरह बर्बादी करने की जगह हम बकरा खरीदने का पैसा ही गरीब, बेसहारा लोगों को दे दें, यह कार्य मुझे ज्यादा बेहतर लगता है.


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