तेजी से घटी हिंदुओं की जनसंख्या के लिए जिम्मेदार है आज का दिन अर्थात 25 जून 1975 (इमरजेंसी).. 60 लाख की हुई थी नसबंदी जिसमे ज्यादा हिन्दू थे

पिछले साल जिस अभियान को ले कर राष्ट्र निर्माण संस्था के अध्यक्ष श्री सुरेश चव्हाणके जी ने पूरे भारत की बीस हजार किलोमीटर की यात्रा की उस अभियान का मूल संदेश यही था की भारत में तेजी से घट रही है हिन्दू समाज की आबादी और अचानक से बढ़ी है मुस्लिमों की आबादी. भारत की जनसंख्या में तेजी से आ रहा असंतुलन जो आने वाले समय के लिए पैदा कर सकता है देश के आगे कई समस्याएं. उसके कुछ दिन बाद ही कश्मीर के मुफ़्ती ने मुसलमानो की आबादी को आधार बना कर एक नया देश मांग लिया था. थोड़े समय बाद कई स्थानों पर ISIS के झंडे दिखाए जाने , पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी आदि की घटनाएं सामने आने लगी .

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अचानक ही इतनी तेजी से घटी हिन्दुओ की आबादी और मुस्लिमों की तेजी से बढ़ी आबादी और उस से उतपन्न जनसंख्या असंतुलन की जड़ में कहीं न कहीं आज का दिन अर्थात 25 जून है जब 1975 में इसी तारीख को भारतीय लोकतंत्र का काला दिन परोक्ष रूप से घोषित करते हुए भारत देश में आपातकाल लागू किया गया और जनता के सभी नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे. इस फैसले के बाद तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के लिए सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा और पहली बार उनके खिलाफ एक देशव्यापी विरोध पनपने की शुरुआत हुई. लेकिन जब तक मामला सम्भलता तब तक हो चुकी थी काफी देर और बिगड़ चुका था बहुत कुछ. इस आदेश का शिकार एक ही पक्ष बन चुका था जिसने सदा से सरकारी आदेश को स्वीकार किया था ईश्वरीय आदेश से ऊपर रखते हुए.

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कुछ ऐसे लोग भी थे जिनके लिए उनके मज़हबी आदेश तब भी और अब भी सर्वोपरि थे और हैं इसके लिए उन्होंने उस समय सरकार के इस आदेश को सिरे से ख़ारिज कर डाला. उस समय उन्होंने सरकार से अपनी मज़हबी भावनाओ को सबसे ऊपर रखते हुए ठीक वैसे ही संघर्ष किया था जैसे आज कश्मीर में कुछ लोग सत्ता और सेना आदि के खिलाफ कर रहे हैं. उस समय आपातकाल ने देश के राजनीतिक दलों से लेकर पूरी व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया लेकिन उस वक्त लिए गए नसबंदी जैसे सख्त फैसले ने इसे राजनीतिक गलियारों से इतर आमजन के निजी जीवन तक पहुंचा दिया. जनता के अधिकार पहले ही छीने जा चुके थे फिर नसंबदी ने घर-घर में दहशत फैलाने का काम किया. उस दौरान गली-मोहल्लों में आपातकाल के सिर्फ एक ही फैसले की चर्चा सबसे ज्यादा थी और वह थी नसबंदी.

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यह फैसला आपातकाल का सबसे दमनकारी अभियान साबित हुआ. सरकारी अधिकारियो को जब नसबंदी लागू कराने का जिम्मा सौंपा गया था जमीन पर उन्होंने इसे कांटों जैसा सख्त और निर्मम बना दिया. इस दौरान घरों में घुसकर, बसों से उतारकर और लोभ-लालच देकर लोगों की नसबंदी की गई. सभी सरकारी महकमों को साफ आदेश था कि नसंबदी के लिए तय लक्ष्य को वह वक्त पर पूरा करें, नहीं तो तनख्वाह रोककर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. सख्ती से लेट-लतीफ कही जाने वाली नौकरशाही के होश उड़ गए और सभी को अपनी नौकरी बचाने की पड़ी थी. नसबंदी का फैसला इंदिरा सरकार ने जरूर लिया था लेकिन इसे लागू कराने का जिम्मा उनके छोटे बेटे संजय गांधी को दिया गया.

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स्वभाव से सख्त और फैसले लेने में फायरब्रांड कहे जाने वाले संजय गांधी के लिए यह मौका एक लॉन्च पैड की तरह था. इससे पहले संजय को राजनीतिक रूप से उतना बड़ा कद हासिल नहीं था लेकिन नसबंदी को लागू करने के लिए जैसी सख्ती उन्होंने दिखाई उससे देश के कोने-कोने में उनकी चर्चा होने लगी. उस समय हिन्दू समाज की संख्या मुस्लिमो से काफी अधिक थी और अगर आंकड़ों और तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो उसके बाद ही जनसंख्या का अनुपात बहुत तेजी से बदला . हिन्दू समाज के कई लोगों ने सरकारी आदेश को पूरी तरह से स्वीकार करते हुए खुद ही अस्पतालों में जा कर अपनी नसबंदी करवा ली और सरकार के इस आदेश को खुद से ही पारित और प्रशसिरत करने की मुहीम छेड़ दी.

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अमेरिका जैसे कई अन्य मुल्कों का मानना था कि भारत कितना भी उत्पादन क्यों न कर ले लेकिन विशाल जनसंख्या का पेट भरना उसके बस में नहीं. वैश्विक दबाव और परिवार नियोजन के अन्य फॉर्मूले फेल साबित होने पर आपातकाल ने नसबंदी को लागू करने के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया. लेकिन इस फैसले के पीछे संजय गांधी की महत्वाकांक्षा भी थी क्योंकि उन्हें खुद को कम वक्त में साबित करना था और इसके चलते ही एक ही वर्ग का दमन हुआ जिसका दुष्परिणाम आज तक देखने को मिल रहा है . एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक साल के भीतर देशभर में 60 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई. इनमें 16 साल के किशोर से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक शामिल थे. यही नहीं गलत ऑपरेशन और इलाज में लापरवाही की वजह से करीब दो हजार लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी.

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