भारत को “माँ” किसी भी हाल में न कहने की चुनौती देने वाला ओवैसी गांधी को माना राष्ट्र “पिता”..


साध्वी प्रज्ञा का बयान राजनैतिक गलियारों में भले ही एक बड़े विवाद और चर्चा का विषय बन गया है लेकिन इसके बाद भी वो बयान कई ऐसे चेहरों को बेनकाब कर गया है जिन्होंने अपने ऐसे रूप को भारत के आगे रखा है जो समाज में विभाजन का विषय बनता रहता है . हैरान करने वाली बात ये है कि ओवैसी जैसे दंगाई लोगों में अभी अचानक ही देशभक्ति का ज्वार फूट पड़ा है और वो गांधी के सम्मान में ऐसे कूद पड़े हैं जैसे कि वो हैदराबाद में उस गद्दार निजाम के समर्थक न हों जो भारत को पाकिस्तान में मिलाने का पक्षधर था .

साध्वी प्रज्ञा की निंदा करते हुए ओवैसी ने बार बार गांधी के नाम के साथ राष्ट्रपिता जोड़ा है . ये वही ओवैसी है जो चुनौती देता है कि उसकी गर्दन पर चाकू भी रख दिया जाय तो भी वो भारत को माता नहीं कहेगा .. अचानक ही ऐसे गद्दारों के मुह से गांधी के लिए राष्ट्रपिता निकलता देख कर सवाल उठता है कि जो गांधी को राष्ट्रपिता मान सकता है वो भारत को माँ क्यों नहीं मान सकता ? सवाल ये भी है कि ये गांधी से दिखाया जा रहा राजनैतिक प्रेम है या भगवा वस्त्रधारी साध्वी ने नफरत ?

15 करोड़ हिन्दुओ को कत्ल कर देने की खुली धमकी देने वाले भारत की शांति , एकता और अखंडता के दुश्मन ओवैसी जैसे लोगों को आप ने खुल कर कहते सुना होता कि उनकी गर्दन पर चाकू रख देने के बाद भी वो वन्देमातरम और भारत माता की जय नहीं बोलेंगे . इतना ही नहीं , उनकी नकल हजारों ने भी और वो भी उनके समर्थक बन कर उनकी हां में हाँ मिलाने लगे थे. आगे चल कर इस बेसुरे सुर में कई अन्य में भी ताल में ताल मिला दी . ओवैसी को व्यापक समर्थन तब मिलता दिखा जब कई मजहबी उलेमा आदि ओवैसी के साथ खड़े होते दिखने लगे और वो सब के सब इसको अपने मज़हबी कायदे कानूनों से जोड़ कर अपने अपने हिसाब से इसकी व्याख्या करने लगे .

कुछ ने इसको हराम तक घोषित कर दिया ..जबकि ये वो नारा था जिस को लगाते हुए भारत के कई वीरों ने ब्रिटिश सत्ता से जंग लड़ी और अपने प्राणों को गंवा दिया था . लेकिन इसके बाद भी कुछ का दावा है कि आज़ादी की जंग में उनसे बड़ा योगदान किसी और का नहीं है . यद्दपि वो ये प्रमाण नहीं दे पाते कि लुटेरे , हत्यारे और आक्रान्ता मुगलों से लड़ी गयी उस जंग में उनका कितना योगदान है जिसको महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी ने बेहद विषम हालत मे लड़ी थी .

आज़ादी की लड़ाई यद्दपि भारत हजार वर्षो से लड़ता आया है लेकिन मात्र उसको 150 वर्षो तक समेट देने की सोच कहाँ से और किस ने पैदा की ये मंथन का विषय जरूर हो सकता है . फिलहाल इन सबमे तमाम मजहबी नियम और कायदों के लागू होने के बाद एक चीज अलग देखने को मिली है .ध्यान देने योग्य ये है कि उन तमाम लोगों जिनके मुह से भारत माता की जय और वन्देमातरम हराम घोषित हो चुका है , उनकी वाल , उनकी सोशल प्रोफाइल और उनकी जुबान पर गांधी को “बापू” या राष्ट्र “पिता” जैसे शब्द अक्सर आ जाया करते हैं .


सुदर्शन के राष्ट्रवादी पत्रकारिता को आर्थिक सहयोग करे और राष्ट्र-धर्म रक्षा में अपना कर्त्तव्य निभाए
DONATE NOW

Share
Loading...

Loading...