निजामुद्दीन और हयात की मांग सुप्रीम कोर्ट से थी कि “रमजान” में बदला जाय मतदान का समय, भूखे प्यासे कैसे डालेंगे वोट ?.. क्या रहा फैसला ?

भारत के संविधान के नियमानुसार होने वाले चुनावों के बीच में एक ऐसी मांग उठी थी जो सीधे सीधे इस्लामिक कानूनों को और उसकी परम्परा को ध्यान में रख कर थी . इसके ऊपर बहस और विवाद तब से ही खड़ा करने की कोशिश की गयी थी जब चुनावों की तारीखों का एलान हुआ था लेकिन उस समय उन्हें ज्यादा समर्थन नही मिला था . एक बार फिर से उसी मांग में एक और तथ्य जोड़ कर तिथि नहीं तो समय बदलने की मांग हुई थी, जिस पर आखिरकार चुनाव आयोग ने फैसला ले ही लिया है .

ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के जवाब में चुनाव आयोग ने रमज़ान के दिनों में मतदान के लिए समय में किसी भी प्रकार के फेरबदल से साफ साफ़ इंकार करते हुए सब कुछ नियत तिथि और समय पर चलते रहना निर्धारित किया है .  इसी के साथ अब चुनावों में किसी भी प्रकार के बदलाव की सम्भावनाएं पूरी तरह से समाप्त हो गयी हैं . चुनाव आयोग का ये फैसला मजहबी मान्यताओ से नही बल्कि भारत के संवैधानिक मूल्यों से लिया गया था जिसको संवैधानिक संसथाओ की एक बड़ी जीत माना जा रहा है .

भारत में इसी मंगलवार से रमजान शुरू हो रहे हैं जिसको एक विषय बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में वकील मोहम्मद निज़ामुद्दीन पाशा और असद हयात ने रमज़ान में पड़ने वाले तीन चरण के मतदान के समय में बदलाव के लिए याचिका दायर की थी. इस याचिका में कहा गया था कि भीषण गर्मी और रमज़ान के उपवास को देखते हुए मतदान सुबह सात बजे के बजाए सुबह साढ़े चार या पांच बजे से कराना चाहिए ताकि लोगों को कम मुश्किलें आएं. भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने पिछले गुरुवार को चुनाव आयोग से इस मामले पर फैसला लेने का कहा था. लेकिन चुनाव आयोग ने बाक़ी के तीन चरणों में मतदान के समय सीमा में किसी बदलाव से इनकार किया है. `- चुनाव आयोग के मुताबिक़ कोशिश की गई है कि चुनाव शुक्रवार को नहीं पड़े लेकिन समय सीमा में बदलाव करना संभव नहीं है.

 

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