हिंदुओं से अक्सर हिंदी में, अंग्रेजो से अंग्रेजी में संवाद करने वाले गांधी आजमगढ़ में जब मिले थे मुसलमानों से तो जानिए उन्होंने किस भाषा का प्रयोग किया था

इस बार गांधी की 150 वीं जयंती मनाई गई और उसकी बधाई न सिर्फ देश बल्कि दुनिया के कोने कोने से सुनाई दी . इसको सफल और भव्य बनाने के लिए न सिर्फ भारत सरकार बल्कि कई प्रदेशो की सरकारों ने जी तोड़ कोशिश की . प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने गांधी के तमाम अच्छे पक्षों को जनता के आगे रखा था. यद्दपि सुदर्शन न्यूज के प्रधान सम्पादक श्री सुरेश चव्हाणके जी ने सिर्फ और सिर्फ गांधी को आज़ादी का श्रेय देना उचित नहीं समझा और बलिदान हुए क्रांतिकारियों की मजबूती से पैरवी की..

गांधी का आम जनता से मिलने का अंदाज़ और तरीका भी एकदम अनोखा था.. वो किस से किस रूप में मिलना है और किस को क्या पसंद आएगा ये शायद बेहतर जानते थे इसीलिए जब वो हिन्दुओ से मिलते थे तो उनकी बोलने और लिखने की भाषा हिंदी हुआ करती थी, वहीँ जब वो अंग्रेजो अर्थात ईसाईयो से मिलने जाया करते थे तो फर्राटेदार अंग्रेजी बोल कर मिलते थे.. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वो जब मुसलमानों से मिलने जाते थे तो उनकी भाषा और शैली बदल जाया करती थी ..

एक ऐसे मामले से इसका उदाहरण मिलता है जब गांधी उत्तर प्रदेश के जनपद आजमगढ़ की यात्रा पर थे तो . गांधी का चरखा , उनकी रस्सी , उनकी घड़ी तक सहेज कर रखने वाले भारत में ये बात बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि गाँधी ने उर्दू में एक खत भी लिखा था जो आज भी धरोहर के रूप में संजो कर रखा हुआ है. माना ये जा रहा है कि ये उर्दू पत्र साल 1930 में लिखा गया था,. इसको लिखने  के पीछे की कहानी भी अपने आप में लाजवाब है और गांधी को और बेहतर ढंग से समझने के लिए पर्याप्त भी ..

उस दौरान 26 और 27 फरवरी को दिल्ली में आयोजित हिंदुस्तानी प्रचार सभा की बैठक में मौलाना सलमान नदवी देवी को लिखा गया था जिसमें मौलाना से बैठक में आने की विनती की थी.. गांधी जब यहां पहुंचे थे तब मगरिब की नमाज पढ़ी जा रही थी,  वहीं गांधी बैठ गए जहां पर लोगों से मुलाकात की और एक व्यक्ति ने गांधी से आटोग्राफ मांगा. गांधीज ने आटोग्राफ उर्दू भाषा में दिया था जिसके बाद लोगों को समझ में आया की गांधी उर्दू भाषा में भी प्रवीन थे..

इस उर्दू पत्र के बारे में आपको बता दें जिसमें लिखा था – ‘भाई साहब, 26 और 27 फरवरी को दिल्ली में हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की कॉन्फ्रेंस होने को है. मैं चाहता हूं कि इसमें आप भी शामिल हों, और इस सवाल को सुलझाने में हिस्सा लें। मुझे आशा है कि आप जरूर आएंगे। आप आने की तारीख और वक्त की खबर देंगे। आपका मिनकाफ गांधी। यह पत्र बेहद ही दुर्लभ बताया जा रहा है जिसे अब भी संभलकर रखा गया है.. नीचे देखिये वो दावे जिसमे गांधी द्वारा यही नहीं बल्कि कई अन्य पत्र भी उर्दू में लिखे जाने का दावा किया गया है –

 

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