Breaking News:

लुटेरे बाबर की किताब “बाबरनामा” के झूठ से कई हिन्दू ही मान बैठे कि राणा सांगा ने बुलाया था हत्यारे बाबर को.. ये रहा असल सत्य

कई लोग ये कुप्रचार कर रहे हैं कि राणा सांगा ने बाबर को इबराहिम लोदी के विरुद्ध लड़ने के लिये आमंत्रित किया था। ये दुष्प्रचार करने वाले सिर्फ बाबर ही नही बल्कि तमाम श्रीराम भक्त भी हैं. यद्द्पि उनकी गलती नही है ये, वो वही बात  कर रहे हैं जो वामपंथी इतिहासकार उन्हें समझा कर गए हैं..उन्होंने एक बार भी ये नही सोचा कि एक धर्मयोद्धा एक अधर्मी का साथ क्यों लेगा धर्मयुद्ध में..राणा सांगा की महानता पर जो सवाल हिन्दू धर्म से द्वेष रखने वाले इतिहासकार खड़ा करना चाहते थे वो आखिरकार सफल रहे और उन्होंने वो सब कुछ पाठकों के मन मे भर दिया जो वो चाहते थे.. जानिए तथ्यों के साथ वो सभी प्रमाण जो बताएगा राणा सांगा की महानता के साथ साथ बाबर की नीचता व तमाम हिन्दू विरोधी कलमकारों की साजिश को भी.

१:- आक्षेप का मुख्य आधार है बाबर की तारीफ करती किताब’बाबरनामा’ .. इसी के आधार पर ऐसा कहते हैं कि बाबर को राणा ने बुलाया; और वो भी इब्राहीम लोदी के विरुद्ध युद्ध लड़ने!ये कोई इतिहास का ग्रंथ नहीं है, ये बाबर की डायरी है, जिसमें उसके संस्मरण लिखे गये हैं। कई जगह तो उनमें इतनी अश्लीलता है कि कोई भारतीय व्यक्ति पढ़कर बाबर से घृणा करने लगे। यद्द्पि कलमकारों ने बाबर ने निकृष्ट चरित्र को उसमें से नही बताया और सिर्फ हिन्दू राजाओं के गलत चित्रण को उसमें से उठा लिया जो बाबर की साजिश को साफ साफ दिखाते हैं..

उसने इस ग्रंथ में ऐसी बहुत सी बातें लिखी हैं जो कोई भी समझदार भारतीय व्यक्ति नहीं मानेगा-“भारतवर्ष एक ऐसा देश है, जिसमें बहुत कम आकर्षण है। न यहां के लोगों में प्रचिभा है, न शक्ति। यहां पर किसान नंगे घूमते हैं।किसी को ढंकने का एक चिथड़ा तक नहीं हैं।” यह बताने के लिये कोई इतिहास का पीएचडी होने का जरूरत नहीं है कि ये सब कोरी बकवास है । राजस्थान व दक्षिण भारत की कलाकारी बाबर की बकवास को झुठला रही है । गजनवी के तोड़े गये मथुरा व सोमनाथ मंदिर जैसी सुंदर इमारतें बाबर ने अपने जन्म में भी नहीं देखी थीं। यदि भारत में कम आकर्षण था तो गोरी और गजनी यहां क्यों आये थे?

२:- इतिहासकारों का इस पर विचार:- ऐसा हर इतिहासकार मानता है कि राणा सांगा का दूत बाबर से मिला था,तथापि इस बात को किसी ने नहीं उठाया, न किसी ने महत्व दिया।कारण यह है कि बाबर के लेख को शायद ही कोई महत्व देता हो। इसी कारण से जयचंद, आंभी,मानसिंह,जयसिंह और मीर जाफर की तरह राणा सांगा को गद्दार भी नहीं बोला जाता । विदेशी इतिहासकार जेम्स टॉड ने “राजस्थान का इतिहास” में इसकी चर्चा तक नहीं की। डॉ आशीर्वादी लाल ‘मुगलकालीन भारत’ में इस बात को कोई महत्व नहीं देते। अन्य इतिहासकार भी इसको कोई तवज्जो नहीं देते।

३:- राष्ट्रवादी इतिहासकारों के प्रमाण:- इतिहासकारों का मत है कि राणा सांगा उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा थे। उनके किसी की सहायता की जरूरत ही नहीं थी।उन्होंने मालवा,गुजरात व दिल्ली में लोदी से कई बार टक्कर ली और उसको धूल चटाई थी। हम एक एक कर इस विषय पर इतिहासकारों का मत रखते हैं:-

(क) श्रीराजेंद्र शंकर भट्ट कहते हैं-“दिल्ली के सुल्तान की पराजय ने मेवाड़ की धाक सारे देश में जमा दी..।”( मेवाड़ के महाराणा प्रताप व शाहंशाह अकबर पृष्ठ २)

(ख) गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं-“इब्राहीम लोदी की यह पराजय महाराणा की प्रतिष्ठा बढ़ाने में बड़ी सहायक बनी।…राजनैतिक धुरी मेवाड़ की ओर घूमी और सभी शक्तियां राणा की शक्ति को मान्यता देने लगी।…. राणा इन विजयों से राजपूत संगठनों का नेता स्वीकार लिया गया और उसके व्यक्तित्व में हिंदू शौर्य की आभा देदीप्यमान होने लगी।”(मेवाड़ पेज २६७)

(ग) डॉ आशीर्वादी लाल कहते हैं-“मेवाड़ के पराक्रमी राजा राणा सांगा को परास्त करने….इब्राहीम लोदी ने मियां खान,हुसनबख्श,जरबख्श जैसे विख्यात अफगान सेनानायकों के साथ एक शक्तिशाली सेना भेजी।… उसमें ३०,००० अश्वारोही और ३०० हाथी थे।….युद्ध में दिल्ली सेना का भयंकर संहार हुआ। मियां मक्खन खान तथा उसके सैनिक घबराकर भाग खड़े हुये। किंतु राजपूतों ने बूंदी की सीमापर उन पर आक्रमण किया और बड़ी संख्या में उनको मार डाला।” टिप्पणी में कहा है कि बाबर भी लोदी की हार का जिक्र करता है। ( दिल्ली सल्तनत २३३)

४:- तो फिर बाबर को किसने बुलाया था?-

बाबर १५११ई से भारत पर हमला करने की सोच रहा था।चौथे प्रयास(१५२४ ई) की तैयारी से पहले ही पंजाब के गवर्नर दौलत खाम लोदी ने उसको आक्रमण के लिये आमंत्रित किया था। दरअसल इब्राहीम लोदी से उसकी अन बन हो गई थी और वो पंजाब का स्वतंत्र शासक बनना चाहता था। यह निमंत्रण प्राप्त कर बाबर लाहौर को चल दिया। लाहौर जीतकर काबुल चला, तब लोदी के चाचा आलम खान लोदी वहां जाकर उससे मिला। दिल्ली पर अधिकार के लिये उसने अपने भतीजे के विरुद्ध बाबर का साथ दिया।शर्त ये थी कि बाबर पंजाब का शासक बन जायेगा और दिल्ली का राजा आलम खान बनेगा।

कुल मिलाकर यही मुगलशासन की आधारशिला थी। व्यर्थ ही राणा सांगा को इसके आधार पर बदनाम किया जा रहा है।

( हिंदू इतिहास वीरों की दास्तान पेज नं ४०- लेखक राजेशार्य आट्टा। विदित हो कि लेखक की एक पुस्तक “स्वाभिमान का प्रतीक: मेवाड़ काफी लोकप्रिय हुई। इसकी ग्यारह हजार प्रतियां गुजराती में छपकर हाथोहाथ बिक गई)

५:- अब हम उन वादियों से पूछना चाहते हैं, जो राणा पर ऐसा कपोलकल्पित आरोप करते हैं , कि:-

(a) इब्राहीम लोदी की हार का इससे बड़ा प्रमाण क्या चाहिये? क्या उसे बारंबार हराने के बाद भी राणा सांगा को बाबर की जरूरत थी?

(b)इब्राहीम लोदी वैसे ही एक अप्रिय और निर्बल शासक था। उसके राज्य में चारों ओर विद्रोह थे।उसके विद्रोहियों दौलत खां लोदी और आलम खां लोदी ने ही बाबर को भारत पर आक्रमण करने हेतु आमंत्रित किया ,यह ऊपर लिख चुके हैं।

(c)प्राणों की बाजी लगाकर कन्वाहा(१५२७ ई) की लड़ाई जीतने के बाद भी बाबर ने मेवाड़ को स्वतंत्र क्यों रहने दिया?

(d)बाबर ने हुमायूं की बीमारी अपने ऊपर लेकर मर गया- ये झूठा चमत्कार क्यों प्रचारित किया जाता है?

(e)डॉ श्रीवास्तव लिखते हैं-” बाबर विजित लोगों को घृणा की दष्टि से देखता था।हमारे पूर्वजों में बुद्धि,वैभव और प्रतिभा की कमी नहीं थी। इसलिए हमें बाबर की कुछ धारणाओं को यूं ही सही नहीं मान लेना चाहिये।”

साफ है कि इतिहासकारों का विचार है कि यदि इब्राहीम लोदी को हराने में सांगा खुद समर्थ थे, तो उनको बाबर को बुलाने की क्या जरूरत थी? और बाबर को बुलवा दिया फिर भी सहायता क्यों न ली? क्या बाबर ने उनकी सहायता की, ऐसा कोई प्रमाण है?

(f)बाबर ने जबरन राणा सांगा के क्षेत्र पर अधिकार करके उसको चुनौती क्यों दी?

अतः सिद्ध है कि बाबर का लेख तत्कालीन भारतीयों के मन में राणा सांगा के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिये लिखा गया है या फिर स्वयं को वीर सिद्ध करने की डींग में, कि राणा सांगा तक उसकी सहायता की आवश्यकता महसूस करते थे।

६:- इतिहास में हस्तक्षेप न हो:- हम रोमिला थापर का एक प्रमाण देकर उपसंहर करते हैं।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार रोमिला ने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में ११ जनवरी २००८ में बोलते हुये कहा-

“इतिहास के साथ राजनीति की जा रही है और इतिहास, इतिहासकारों की पहुंच से बाहर हो रहा है। इतिहासकारों में निष्पक्षता की कमी आ रही है। लेकिन राजनीतिज्ञों को भी इतिहास में हस्तक्षेप करने से परहेज करनी चाहिये ।”

अब सवाल उठता है कि आखिर किस आधार पर एक विदेशी अय्याश आक्रांता के लेख को प्रमाण मानकर हम राणा सांगा को देशद्रोही कहेंगे?जिसके पक्ष में कोई और साक्ष्य नहीं है। केवल बाबरनामा के आधार पर हम भारतीय अपने वीर पूर्वज राणा सांगा पर दोष लगाए ?

Share This Post