बाबर की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में खड़े मुस्लिम पक्ष की श्रीराम मन्दिर पर दी गई दलील सवाल करती है कि कहाँ है सेकुलरिज्म ?


आख़िरकार भारत में कौन है धर्मनिरपेक्ष ? कौन है असहिष्णु ? क्या वही जिनके खिलाफ दुष्प्रचार में लगातार व्यस्त रहा भारत का वो मीडिया वर्ग और उनके पीछे तथाकथित बुद्धिजीवी समाज भी जो कभी स्क्रीन काली कर के तो कभी पुरष्कार लौटा कर हिन्दुओ के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था . क्या वही जो पिछले कुछ समय से कभी गौ रक्षको को तो कभी जय श्रीराम के नारों को बदनाम करने में लगे हुए थे.. सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों की दी गई दलील ने बहुत कुछ साफ़ कर दिया है .

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ध्यान देने योग्य है कि अजमेर की दरगाह से ले कर बाकी अन्य तमाम मजारों आदि पर भले ही हिन्दुओ की भारी भीड़ जुट कर ये साबित करती हो कि वो सच्चे सेक्युलर हैं लेकिन हिन्दुओ के सर्वोच्च आराध्य भगवान् श्रीराम के लिए अदालत में मुस्लिम पक्ष ने दी है एक दलील . श्रीराम के खिलाफ बाबर की तरफ से खड़े हुए मुस्लिम पक्ष का परोक्ष रूप से अदालात में ये कहना है कि अयोध्या मामले का फैसला अदालत हिन्दुओ की आस्था को नजरअंदाज़ करते हुए सीधे सीधे कानूनी रूप और नियमो के अनुसार दे..

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ये दलील एक बड़ा सवाल है कि क्या हिन्दुओ की आस्था अयोध्या में मुस्लिम पक्षकार नहीं मानते ? अगर हिन्दू अयोध्या में आस्था नहीं रखेगा तो आख़िरकार कहाँ रखेगा ? मुस्लिम पक्ष के वकील ने साफ़ साफ़ कहा है कि स्वयंभू और परिक्रमा के दस्तावेजों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं। राजीव धवन ने पुराने केस और फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि देवता की संपत्ति पर कोई अधिकार नही, केवल सेवायत का ही होता है। मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से वकील ने कोर्ट से कहा कि भूमि विवाद का निपटारा कानून के हिसाब से हो, ना कि स्कंद पुराण और वेदों के जरिए। 

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