वर्दी का सम्मान किसे कहते हैं इसको कोई IPS अमिताभ ठाकुर से पूछे, जिन्हें दी गयी थी अंतहीन प्रताड़ना… #तेजबहादुर

आवाजें सुनाई दे रही हैं सेना और वर्दी वालों के सम्मान की लेकिन ये सच है कि किसी का अतीत कभी कभी उसके आने वाले कल का प्रतिबिम्ब होता है .. अगर थोडा सा पीछे जाया जाय तो वर्दी के लिए किस के मन में क्या है इसको आराम से देखा और समझा जा सकता है . मसलन थोड़े ही समय पहले उत्तर प्रदेश में अपराधियों का सामना कर रहे पुलिस के जवानो के खिलाफ जिस प्रकार से हल्ला बोला गया था वो सबको निश्चित रूप से ज्यों का त्यों याद होगा ..

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अब बात वर्तमान की कर लिया जाय . सेना पर पत्थर मारने को लोकतंत्र की आज़ादी तक कहने वालों ने अचानक ही एक पूर्व व् वर्तमान में बर्खास्त सैनिक तेज बहादुर को आगे किया है और खुद को सेना प्रेमी कहना शुरू कर दिया है . उन्ही तेज बहादुर को नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतारा गया है और उनका प्रचार किया जा रहा है . यद्दपि लोकतंत्र में किसी को भी कुछ भी करने का अधिकार है जो संवैधानिक रूप से सही हो लेकिन जब बात वर्दी के सम्मान की आये तो अतीत में झांकना जरूरी होता है .

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अगर आप ने किसी फिल्म में तमाम बन्दिशो में बंधे एक पुलिस वाले और मुक्त स्वतंत्र नेता की जंग देखी हो तो उसमे जिस भी अभिनेता का रोल आपको दिखेगा उसका संघर्ष फिल्म में उस IPS अमिताभ ठाकुर से बहुत कम होगा जो असल जीवन में भारत के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक राजनेता से जूझ रहा है . न्याय की ये जंग तब भी जारी थी जब खुद उन्ही राजनेता के बेटे की सरकार थी भले ही इसके बदले उनको झेलनी पड़ी हो अंतहीन प्रताड़ना. और वो जंग आज भी जारी है , जिसको किसी राजनेता ने “न्याय” का नाम नहीं दिया.

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10 जुलाई 2015 को आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन्हें फोन पर धमकी दी थी. पुलिस ने इस मामले में पहली बार अक्टूबर 2015 में अपनी रिपोर्ट लगाई थी, लेकिन ठाकुर ने इस पर सवाल उठाते हुए कोर्ट में इसे चुनौती दी थी. अदालत ने 20 अगस्त 2016 को पुलिस को मामले की जांच करने के आदेश दिए थे. इसके बाद पुलिस ने मुलायम की आवाज का नमूना लेने की कोशिश की थी, लेकिन मुलायम ने इससे इनकार कर दिया था. हालांकि बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि कॉल रिकॉर्डिंग में उन्हीं की आवाज है.

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यहाँ भारत के उन तमाम राजनेताओं के दोहरे चरित्र भी उजागर हो रहे हैं जो लखनऊ में आईपीएस अमिताभ ठाकुर को न्याय की लड़ाई में अकेला छोड़ चुके हैं . लेकिन ये पुराना इतिहास ये साबित करता है कि आज अचानक ही वर्दी भक्त बन गये कुछ लोगों ने अपने रसूख के समय वर्दी का कितना सम्मान किया था . वो हिम्मत थी और मनोबल था आईपीएस अमिताभ ठाकुर का जो इतने बुरे दिनों में भी उनके कदम नहीं लडखडाये अन्यता कई कई अधिकारियो की दबाव के चलते आत्महत्या आदि के मामले सबको समय समय पर सुनाई देते रहे हैं . क्या सच में उन्हें वर्दी से इतना ही प्यार है ?

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