रिपोर्ट में दावा .. देश के लगभग 50% पुलिस वाले मुसलमानों के बारे में सोचते हैं ये सब… सुधार किस में जरूरी .. पुलिस में या …. ?

क्या इस रिपोर्ट के बाद ये सवाल उठने लगेंगे कि सुधार की सम्भावना पुलिस विभाग में है ? इस से पहले यही आरोप न जाने कितने संगठनों और समूहों पर लग चुका है लेकिन हर बार एक ही पक्ष में सुधार की सम्भावना बताई गई और दूसरे पक्ष को अक्सर बुद्धिजीवी वर्ग क्लीन चिट दे डाला.. ये भी सम्भव है कि इस बार हल्ला बोल पुलिस के खिलाफ ही हो जाए लेकिन सवाल ये है कि आख़िरकार कब वो समय आएगा जब दूसरे पक्ष को भी आत्ममंथन के लिए कहा जाएगा..

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विदित हो कि एक नई रिपोर्ट ने एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर पर हंगामा मचा दिया है . इस रिपोर्ट में माना गया है कि भारत के 50 प्रतिशत पुलिस वाले ये मानते हैं कि मुसलमानों में ज्यादा अपराधिक कार्य करने वाले पाए जाते हैं.. यद्दपि ये रिपोर्ट जिसने भी बनाई है उसके सर्वे को किसी भी रूप में पूरी तरह से प्रमाणिक नहीं माना जा सकता है लेकिन सम्भव ये है कि आने वाले समय में कोई ऐसे ही रिपोर्ट भारतीय सेना के बारे में भी प्रस्तुत करे जिसके बाद तथाकथित डर का जिन्न फिर से बोतल से बाहर आ जाए .

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डर का वही माहौल जो कभी नसरुदीन शाह और आमिर खान जैसों ने बनाना चाहा था.. मंगलवार को जारी लोकनीति और काॅमन कॉज की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।सर्वे की रिपोर्ट ‘2019 Status of Policing in India’ के अनुसार, सर्वे में शामिल कुल पुलिसकर्मियों में से 35 प्रतिशत मानते हैं कि यदि भीड़ किसी गोकशी के मामले में आरोपी को सजा देती है, तो यह स्वभाविक बात है। इसी तरह 43 प्रतिशत पुलिसकर्मी मानते हैं कि किसी बलात्कार के आरोपी को भी भीड़ द्वारा सजा देना स्वभाविक प्रतिक्रिया है।

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देश के 48% पुलिसकर्मियों को लगता है कि मुसलमान आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं। इनमें 14% को लगता है कि उनके अपराध करने की संभावना बहुत हद तक है, जबकि 34% को लगता है कि यह प्रवृति काफी हद तक है। दूसरी ओर, 56% पुलिसकर्मियों का मानना है कि ज्यादातर हिंदू अपराध की ओर नहीं जाते। यह सर्वेक्षण ‘स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया 2019’ नाम की रिपोर्ट में प्रकाशित हुआ है जिसे देश भर के इक्कीस राज्यों में बारह हजार पुलिस वालों से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है.

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सर्वेक्षण में पुलिसकर्मियों के परिवार के भी करीब ग्यारह हजार सदस्यों की राय को शामिल किया गया है. पुलिस राज की वकालत करने वाले पुलिसकर्मियों की कमी नहीं है. बल्कि सैंतीस फीसद पुलिसकर्मी तो यह मानते हैं कि ऐसे अपराधों में कानूनी प्रक्रिया पूरी करने की ही जरूरत नहीं है बल्कि ऐसे मामलों को सीधे पुलिस को ही सौंप दिया जाना चाहिए.भारत में ज्यादातर पुलिसकर्मियों का मानना है कि मुसलमान स्वाभाविक तौर पर आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं और अपराध की ओर उनका झुकाव रहता है..  निश्चित तौर पर इस समय एक खास बुद्धिजीवी वर्ग के निशाने पर एकतरफा पुलिस वाले ही आ गये होंगे जबकि उन्होंने अपनी तरफ से दूसरे वर्ग को क्लीन चिट जैसा दे दिया होगा ..

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