गोरखपुर के कफील की क्लीन चिट वाली अफवाह उड़ाने वाले तो नहीं बच्चा चोरी और मॉब लिंचिंग जैसी अफवाहों के पीछे ?

ये वही लोग हैं जिन्हें इंतजार रहता है किसी भी मामले में हिंदुत्व और भगवा के खिलाफ बोलने और यहाँ तक की सडको पर उतरने का . इनके ट्विटर तैयार रहते हैं हिंदुत्व के साथ साथ एक पार्टी विशेष के खिलाफ बिना थके ट्विट करने के लिए .. इन्हें चेहरे बार बार एक ही रूप में सामने आते हैं लेकिन उसके बाद भी इन्हें ये लगता है की उनको समाज का हर अंग स्वीकार करे .. एक ही सोच , एक ही विचारधारा के वो लोग थी थे कफील की उस अफवाह को उड़ाने वाले जिस पर विराम उत्तर प्रदेश सरकार ने लगा दिया है .

विदित हो की पिछले लगभग एक सप्ताह से एक अफवाह ट्रेंड कर रही थी की उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने गोरखपुर के मासूमो के कातिल डाक्टर कफील को क्लीन चिट दे दी.. एक जगह से उडी इस अफवाह ने आग का रूप धारण कर लिया और फिर ये मामला बन गया सरकार के साथ उन सभी लोगों के लिए माफ़ी मांगने का विषय जिन्होंने भी उस समय इस मामले में कफील की भूमिका पर सवाल उठाये थे .. यहाँ एक बार और ध्यान रखने योग्य है जो समझनी भी होगी .

अब सक्रिय हुए ये तमाम ट्विटर उस समय एकदम खामोश थे . मतलब उन्होंने मन में और आत्मा से ये शायद मान रखा था की उनके बयान या ट्विट तब ही आयेंगे जब सामने वाला खास कर हिन्दू समाज से होगा और अगर वो बजरंग दल , विश्व हिन्दू परिषद आदि से निकले तो उनके लिए सोने पर सुहागा वाले हालात होते.. उनकी उस समय ख़ामोशी रह रह कर एक मुद्दे पर जरूर टूटती थी की इन मौतों के लिए योगी आदित्यनाथ जिम्मेदार हैं … कहीं भी कफील नहीं .

उस समय शुरुआती जांच शुरू होने से पहले ही मीडिया के उन्ही लोगों ने अचानक ही कफील को एक हीरो के रूप में प्रस्तुत कर दिया था और मामला ऐसे बना दिया था जैसे योगी आदित्यनाथ इस घटना के गुनाहगार और कफील खान इस पूरे मामले का मसीहा.. उस समय सिर्फ सुदर्शन न्यूज ने पूरे तथ्यों के साथ खुलासा किया तो सबके मुह बंद हुए थे और पता चला था की कफील ही इस मामले में आरोपी है जिसने सरकारी काम से ज्यादा अपने व्यक्तिगत कार्यों को प्राथमिकता दी थी .

इतना ही नहीं कफील के ऊपर इस से पहले भी तमाम अपराध थे लेकिन वो मामले एक वर्ग विशेष का विरोध और एक वर्ग विशेष का पक्ष आँख बंद कर के करने वाली मीडिया के वर्ग ने दबा दिए थे.. अब ठीक वही कहानी २ साल पहले की दोहराई जा रही थी और हीरो के रूप में फिर से कफील और दोषी के रूप में योगी आदित्यनाथ को दिखाये जाने की तैयारी थी.. मीडिया का ये वही वर्ग है जिसके तमाम दांव पेच दिल्ली की राजनीति में टूट कर खत्म हो चुके हैं ..

खुद को JNU की जीत तक सीमति कर लेने वाले इन सभी ने अपना मोर्चा उत्तर प्रदेश में खोला हुआ है .. जब शुरू में कफील पर आरोप लगे थे तब इन्ही ने निष्पक्ष जांच के बजाय मुस्लिम कार्ड को तवज्जो दी थी और एक बार फिर से जब उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है की इस मामले में कफील को क्लीन चिट नहीं मिली है तो फिर से इन्होने वही ढर्रा अपना लिया है.. धैर्य की सराहना यहाँ सरकार की करनी होगी जिसने इतनी बड़ी अफवाह उड़ाने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही अब तक नहीं की है .

इस मामले में कफील के भी वीडियो आने लगे थे .. मीडिया का बेहद शौक़ीन कफील गोरखपुर हादसे वाली रात को भी मीडिया को बाईट देता दिखाई दिया था और एक बार फिर से क्लीन चिट वाली अफवाह में भी उसने आगे बढ़ कर खंडन के बजाय उसको बढ़ावा देने का काम किया.. अफवाहों से हालात यहाँ तक बने की फिल्म अभिनेता परेश रावल और कुछ बड़े पत्रकारों ने इस मामले में माफ़ी तक मांग ली अपने पुराने दिखाए गये शो के चलते.. लेकिन सुदर्शन न्यूज सत्य के साथ अड़ा और अडिग रहा..

ट्रायल के समय मीडिया से दूरी तमाम अभियुक्त लोगों ने बनाई है . खास कर उन्होंने तो सबसे जायदा जिनकी जांच चल रही हो लेकिन हैरानी की बात ये रही की इस बीच में कफील सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय दिखाई दिया.. अगर इस अफवाह रूपी साजिश के अन्य पहलू को देखा जाय तो ये साफ दिखाई देता है की जांच में दोषी होने की आशंका से अपने साथियों के साथ उड़ाई गई ये ऐसी अफवाह है जो बाद में एक बड़े स्तर पर मुस्लिम पीड़ित कार्ड खेलने की जमीन तैयार कर दे..

आज के समय देश सोशल मीडिया में बच्चा चोरी और मॉब लिंचिंग जैसी कई अफवाहों का सामना कर रहा है . पुलिस प्रशासन और शासन भी इसको रोकने के लिए तमाम उपायों पर अनुसन्धान कर रहे हैं लेकिन कफील के समर्थन में बिना सरकार से पुष्टि किये ऐसी व्यापक अफवाह उड़ाने वालों के सामर्थ्य को देख कर जरूर लगता है कि अगर गहनता से जांच हो तो बच्चा चोरी जैसी अफवाहों के पीछे भी इन्ही में से कुछ लोग निकल कर सामने आयेगे .. फ़िलहाल सरकार ने अफवाहों का पटाक्षेप कर ही दिया है..

 

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