जानिए कौन थी बेला और कल्याणी, जिसने हिंदुत्व की रक्षा की खातिर आक्रान्ता गौरी के काजी को मार कर आत्मदाह कर लिया..

भारत युगो युगो से महान योद्धाओं का गढ़ रहा है। भारत की धरती पर ना जाने कितने शूरवीर, पराक्रमी, योद्धाओं ने अपने खून से कभी ना मिटने वाला इतिहास लिखा है। ऐसे योद्धाओं में पुरुषों के साथ स्त्री भी है। भारत की नारी कभी भी किसी से पीछे नहीं रही है। वक्त पड़ने पर स्त्रीओं ने अपने शरीर में खून की आखिरी बूंद तक अपने राष्ट्र की, अपने परिवार की और अपनी लाज की रक्षा की है। ऐसे ही भारत की दो बेटियां थी। जिन्होंने अपनी लाज बचाने के लिए आक्रान्ता, नराधम, नरपिशा जिहादी मोहम्मद गौरी और उसके काजी को मौत की गोद में सुलाकर,  मुगलों से अपनी लाज बचाने के लिए आत्मदाह कर लिया। भारत की उन बहादुर बेटियों के नाम थे बेला और कल्याणी।

वर्तमान पीढ़ी अपनी उन दो बहनों को भूल गई हो, लेकिन तत्कालीन भारत के हर एक व्यक्ति के मुख पर उन दोनों का नाम था। बेला शूरवीर पृथ्वीराज चौहान की बेटी थी और कल्याणी जयचंद की पौत्री थी। पृथ्वीराज चौहान जहां देशभक्त और राष्ट्र प्रेमी थे, वही जयचंद एक गद्दार था। लेकिन जयचंद की पौत्री कल्याणी राष्ट्रभक्त थी, और पृथ्वीराज चौहान की बेटी बेला की सखी थी। ये बात उन दिनों की है जब मुहम्मद गौरी भारत को लुट रहा था। हमारे देश के खजाने को लूट कर वह अपने वतन ले जा रहा था। उस समय मुहम्मद गौरी की नजर बेला और कल्याणी पर पड़ी,  तो वह उन दोनों को जबरदस्ती अपने साथ अपने वतन ले गया।  

गौरी जैसे ही अपने वतन पंहुचा तो उसके काजी ने कहा आओ गौरी हमें तुम पर नाज है,  कि तुमने हिन्दुस्तान पर फतह करके इस्लाम का प्रचार किया है. बताओ सोने की चिड़िया हिंदुस्तान के कितने पर काट कर लाए हो। काजी निजामुल्क के पूछने पर गौरी ने कहा कि मै हिन्दुस्तान से सत्तर करोड़ दिरहम मूल्य के सोने के सिक्के, पचास लाख चार सौ मन सोना और चांदी, इसके अतिरिक्त मूल्यवान आभूषणों, मोतियों, हीरा, पन्ना, जरीदार वस्त्रा और ढाके की मल-मल की लूट-खसोट कर भारत से गजनी की सेवा में लाया हूं। मंदिरों को लूटकर 17000 हजार सोने और चांदी की मूर्तियां लायी गयी हैं, दो हजार से अधिक कीमती पत्थरों की मूर्तियां और शिवलिंग भी लाए गये हैं और बहुत से पूजा स्थलों को नेप्था और आग से जलाकर जमीदोज कर दिया गया है. बहुत से लोगों को इस्लाम का गुलाम बनाकर आया हूँ.

हिन्दूस्तान से बंदियों को गुलाम बनाकर भी लाया हूँ। इन गुलामो की सार्वजनिक बिक्री की जाएगी, और कई मुस्लिम देशो में इन बंदियों को बेचा जायेगा. ये सुनते ही काजी ने गौरी की तारीफ करी और कहा कि हमारे लिए कोई खास तोहफा लाए हो या नहीं. गौरी ने हा कहा और बताया कि दो जन्नत की हूरों से भी सुंदर जयचंद की पौत्री कल्याणी और पृथ्वीराज चौहान की पुत्री बेला को बंदी बनाकर लाया हूँ.

काजी की इजाजत पाते ही शहाबुद्दीन गौरी ने कल्याणी और बेला को काजी के सामने लाकर खड़ा कर दिया। कल्याणी और बेला की अद्भुत सुंदरता को देखकर काजी अचम्भे में आ गया, उसे लगा कि स्वर्ग से अप्सराएं आ गयी हैं। उसने दोनों से निकाह करने को कहा और उनके मना करने पर उनसे जबरदस्ती सम्बन्ध बनाने को बोला. तो बेला और कल्याणी ने काजी से कहा हम दोनों आपसे निकाह करने के लिए तैयार है. लेकिन हमारी दो शर्तें हैं. काजी ने कहा कि कहो क्या शर्तें हैं तुम्हारी ?  तुम जैसी हूरों के लिए तो मैं कोई भी शर्त मानने के लिए तैयार हूं। दोनों राज कुमारियों ने कहा. पहली शर्त तो ये है कि शादी होने तक हमें अपवित्र न किया जाए, और दूसरी शर्त है कि हमारे यहां प्रथा है कि लड़के के लिए लड़की के यहां से विवाह के कपड़े आते हैं। अतः दूल्हे का जोड़ा भारत से आयेगा। काजी ने कहा की मुझे मंजूर है.

बेला और कल्याणी ने भारत में कवि चंद के नाम एक रहस्यमयी खत लिखा, और भारत भूमि से काजी के लिए दूल्हे का जोड़ा मंगवा लिया। काजी के साथ बेला और कल्याणी के निकाह का दिन निश्चित हो गया। रहमत झील के किनारे बनाए गए नए महल में निकाह की तैयारी शुरू हुई। कविचंद द्वारा भेजे गये कपड़े पहनकर काजी  विवाह मंडप में आया। निकाह को देखने के लिए बाहर जनता की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। तभी बेला ने काजी से कहा हमारे होने वाले सरताज हम कलमा और निकाह पढ़ने से पहले जनता को झरोखे से दर्शन देना चाहती हैं, क्योंकि विवाह से पहले जनता को दर्शन देने की हमारे यहां प्रथा है, और फिर गजनी वालों को भी तो पता चले कि आप बुढ़ापे में जन्नत की सबसे सुंदर हूरों से निकाह कर रहे हैं। निकाह के बाद तो हमें जीवन भर बुरका पहनना ही है. तब हमारी सुंदरता का होना न के बराबर ही होगा।

इस पर काजी ने कहा हां हां क्यों नहीं। काजी ने उत्तर दिया और कल्याणी और बेला के साथ राजमहल के कंगूरे पर गया, लेकिन वहां पहुंचते-पहुंचते ही काजी के दाहिने कंधे से आग की लपटें निकलने लगी, क्योंकि कविचंद ने बेला और कल्याणी का रहस्यमयी पत्र समझकर बड़े तीक्ष्ण विष में सने हुए कपड़े भेजे थे। काजी विष की ज्वाला से पागलों की तरह इधर-उधर भागने लगा, तब बेला ने उससे कहा तुमने ही गौरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसाया था, हमने तुझे मारने का षड्यंत्र रचकर अपने देश को लूटने का बदला ले लिया है। हमे हिंदुत्व प्यारा है, हम हिन्दू कुमारियां हैं समझे, किसमें इतना साहस है जो जीते जी हमारे शरीर को हाथ भी लगा दे।

कल्याणी बोली तुम बड़े मजहबी बनते हो अपने धर्म को शांतिप्रिय धर्म बताते हो. जेहाद का ढोल पीटने के नाम पर लोगों को लूटते हो और शांति से रहने वाले लोगों पर जुल्म ढाहते हो, थू धिक्कार है तुम पर इतना कहकर उन दोनों बालिकाओं ने महल की छत के बिल्कुल किनारे खड़ी होकर एक-दूसरी की छाती में विष बुझी कटार जोर से भोंक दी और उनके प्राणहीन देह उस उंची छत से नीचे लुढ़क गये। पागलों की तरह इधर-उधर भागता हुआ काजी भी तड़प-तड़प कर मर गया।

भारत की इन दोनों बहादुर बेटियों ने विदेशी धरती पराधीन रहते हुए भी बलिदान की जिस गाथा का निर्माण किया, वह सराहने योग्य है आज सारा भारत इन बेटियों के बलिदान को श्रद्धा के साथ याद करता है।

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