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नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती पर 1857 के बलिदानियों को मिलेगा सम्मान.. इन भूले बिसरे पन्नो को पलटने वाले राजनेता हैं नरेंद्र मोदी

1857 का स्वतंत्रता संग्राम कुछ कलमकारों के साथ साथ तमाम नेताओ के लिए याद करना तो दूर चर्चा का भी विषय नही रहा है ..इसकी वजह है कि वो युद्ध ढाल तलवार के साथ लड़ा गया था जिसमें अंग्रेजो के वध के साथ भारतीय शूरवीरो ने अपनी बालियां दी थीं.. उस क्रांति को याद करने व बताने से बिना खड्ग बिना ढाल वाले गाने पर सवाल खड़ा हो जाता जो आजादी के कुछ कथित ठेकेदारों को किसी भी हाल में स्वीकार नही था ..अब 1857 के उन सभी क्रांतिवीरों को मिलने जा रहा है उचित सम्मान और उसको देने वाले राजनेता है नरेंद्र मोदी .. अवसर भी बहुत पवित्र और पावन है . ये दिन है नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी की जयंती का दिन..

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज(23 जनवरी 2019) को नेताजी की 122 वीं जयंती पर लाल किले में सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय का उद्घाटन करेंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक बयान में बताया कि मोदी उसी जगह पर याद-ए-जलियां संग्रहालय (जलियांवाला बाग और प्रथम विश्वयुद्ध पर संग्रहालय) और 1857 (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) पर संग्रहालय और भारतीय कला पर दृश्यकला संग्रहालय भी जाएंगे। बोस और आजाद हिंद फौज पर संग्रहालय में सुभाष चंद्र बोस और आईएनए से संबंधित विभिन्न वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है।

इसमें नेताजी द्वारा इस्तेमाल की गई लकड़ी की कुर्सी और तलवार के अलावा आईएनए से संबंधित पदक, बैज, वर्दी और अन्य वस्तुएं शामिल हैं। अपने उग्र विचारों के चलते खून के बदले आजादी देने का वादा करने वाले सुभाष चंद्र बोस का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा है। 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक संपन्न बांग्ला परिवार में जन्मे सुभाष अपने देश के लिए हर हाल में आजादी चाहते थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया और अंतिम सांस तक देश की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे।

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