जन्नत और जहन्नुम क्या है इसे कोई रफ़ीका से पूंछे.. कश्मीर का वो सच जिसके चलते खेली जा रही खून की होली

जन्नत और जहन्नुम की बातें सभी ने सुनी होंगी. चाहे इस्लामिक मौलाना, मौलवी हों या इस्लामिक आतंक के मुखिया.. दोनों ही जन्नत तथा जहन्नुम की परिभाषा बताते हैं तथा समझाते हैं. दोनों में जो एक बात कॉमन होती है वो ये है कि जो इस्लामिक नियम कायदे के अनुसार चलता है उसे जन्नत नसीब होती है तथा जो इस्लामिक नियम के खिलाफ जाता है वो जहन्नुम जाता है. लेकिन ये सब बाद की बातें है लेकिन वास्तविक जिंदगी में जन्नत और जहन्नुम क्या है ये कश्मीर की उस रफ़ीका से पूँछिये जिसका घर इस्लामिक आतंकियों का पनाहगार बना हुआ तथा जिहाद के नाम कश्मीरी लोगों को हिन्दू, हिंदुस्तान तथा भारतीय सेना के खिलाफ भड़काने की प्रयोगशाला बना हुआ था.

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही भारतीय सेना ने कश्मीर के कुपवाड़ा में एनकाउंटर में ४ इस्लामिक आतंकियों को मार गिराया था. बता दें कि रफ़ीका बानो वो मकान मालकिन हैं जिसके घर में आतंकी छिपे हुए थे. जैसे ही भारतीय सेना ने आतंकियों के खिलाफ एक्शन लिया तो सुरक्षा बलों को देखते ही रफ़ीका का बेटा भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन सफल न हुआ तथा गिरफ्तार कर लिया गया. मुठभेड़ के दौरान रफीका के साथ उसके पति मोहम्मद यूसुफ भी गोलियों का शिकार हुए थे. मुठभेड़ के बीच सुरक्षाबलों ने इस दंपति को अचेत अवस्था में सब-डिस्ट्रिक हॉस्पिटल में भर्ती कराया था. इलाज के दौरान शुक्रवार देर शाम नफीसा को तो होश आ गया, लेकिन शरीर से अधिक खून बह जाने की वजह से मोहम्मद यूसुफ की मौत हो गई. सबसे बड़ी बात ये है कि कहा जा रहा है कि मोहम्मद युसूफ को गोलियां उन्ही आतंकियों ने मारी, जिन्हें मोहम्मद युसूफ अपने घर में पाल रहा था व शरण दी थी. होश में आने के बाद रफीका की जिंदगी पूरी तरह से बदल चुकी थी. उसके दिलो दिमाग में मुठभेड के दौरान का मंजर अभी भी हावी था. रफीका के कानों में गोलियों की आवाज अभी भी गूंज रही है. मौत के मंजर का वह अहसास रफीका के दिमाग को लगातार शून्य कर रहा था.

अचानक रफीका को याद आया कि मुठभेड़ के दौरान उसके पति भी गोलियों का शिकार हुए थे. आसपास मौजूद हॉस्पिटल स्टाफ से रफीका ने अपने शौहर के बारे में पूछा. रफीका की हालत को देखकर हॉस्पिटल स्टाफ को समझ नहीं आया कि मुठभेड़ में जान गंवाने वाले उसके पति के बारे में उसे कैसे बताया जाए. हॉस्पिटल स्टाफ के चेहरे पर शून्य देखकर, रफीका की आंखे अपने बेटे सयार अहमद को तलाशने लगती है, लेकिन उसे वहां अपना कोई नजर नहीं आता है. इसी बीच रफीका को अपने जान-पहचान के कुछ लोग अपनी तरफ आते हुए नजर आते हैं. रफीका बड़ी उम्मीद से यूसुफ के बारे में पूछती है. जवाब मिलता है भाईजान अब नहीं रहे. यह सुनते ही रफीका सन्न रह गई. लेकिन वो अफ़सोस भी नहीं कर सकती थी क्योंकि आखिर आतंकियों को अपने घर में उसी ने रखा था.  शनिवार दोहपर रफीका को अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है. जान पहचान के कुछ लोग उसे लेकर उसके घर पहुंचते हैं. घर की हालत देख रफीका के मुंह से तेज आह निकलती है. उसका घर अब घर नहीं रहा था, वह खंडहर में तब्दील हो चुका था. घर के लॉन में मोहल्ले वालों ने एक टेंट लगा दिया था, जिसमें अब उसे अपना आगे का गुजर बसर करना था. रफीका अब इसी टेंट में बदहवास होकर पड़ी हुई है. उससे सहानुभूति जताने आने वाले लोगों को वह एक निगाह देखती है, इसके बाद फिर अपनी आंखे बंद कर लेती है. उसकी हालत अब ऐसी हो गई है कि करवट बदलने के लिए उसे दो से तीन महिलाओं का सहारा लेना पड़ता है. मोहल्ले वालों से ही उसे पता चला कि उसका बेटा पुलिस हिरासत में हैं. जिसके बाद से वह गेट पर होने वाली हर आहट से चौंक जाती है. रफीका के पड़ोसी बताते हैं कि इस मुठभेड़ से पहले रफीका के पास सब कुछ था. कश्मीर की हसीन वादियों में एक प्यारा से घर था. घर में पति मुहम्मद यूसुफ, बुढापे की लाठी बनने वाला जवान बेटा सयार अहमद था जो आतंकियों का रक्षक बना हुआ था व मुठभेड़ के दौरान गिरफ्तार हुआ था.

गौरतलब है कि रफीका और यूसुफ को कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद कुछ समय पहले ही जन्नत सी जिंदगी नसीब हुई थी. दरअसल, यूसुफ के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं थे. लेकिन जैसे तैसे उनका उच्च मकान बनकर तैयार हो गया था. रफ़ीका व उसका परिवार जन्नत का ही अनुभव कर रहा था. लेकिन उनके घर में खुशियां ज्यादा दिनों तक टिकती, इससे पहले ही जिहाद के नाम पर आजादी की मांग करने वाले गैंग के साथ हो गए तथा हिन्दुस्तानी फौजियों के कत्ल के लिए आतंकियों को घर में जगह दे दी. अच्छी खासी जिंदगी जी रहे रफ़ीका के परिवार ने जन्नत की आस में अपने घर को आतंकियों का अड्डा बना दिया. उसे नहीं पता कि जन्नत परिवार की खुशियों के साथ होती है. जब तक परिवार साथ है, तब तक जन्नत आपके कदमों में है, नहीं तो पूरी जिंदगी जहन्नुम ही है. इसका सबसे बडा उदारण अब रफीका है. रफीका के पास न ही मिन्नतों से बनाया घर है और न ही उस घर को बनाने वाला उसका पति है. बेटे का भी अब कुछ पता नहीं. रफीका का घर दोबारा से बनाने के लिए गांव वाले चंदा कर रहे हैं, कुछ महीनों में हम घर भी बना देंगे, लेकिन उस घर में रफीका की जिंदगी की पुरानी खुशियों को अब कोई नही लौटा सकता है. जिस आजादी की मांग के लिए रफ़ीका व् उसका परिवार आतंक के साथ हुआ था वो आजादी तो नहीं मिली लेकिन उसके पति को दुनिया से आजादी मिल गई तथा बेटा सलाखों के पीछे पहुँच गया और अच्छी खासी जन्नत सी जिंदगी जहन्नुम बन गई.

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