कश्मीरी पत्थरबाजों के मुकदमे वापस ले कर एक प्रकार से हरी झंडी दिखाई गयी कासगंज जैसे तमाम इलाकों के कातिलों को

सेना पर जिन्होंने पत्थर फेंके और खुलेआम आतंकियों की मदद की , उन्हें भागने का मौक़ा दिया और फ़ौज के कई जवानो के बलिदान का कारण बने जब देश को आशा थी उन हत्यारों पर कड़ी कार्यवाही की तब अप्रत्याशित रूप से उन्हें प्रोत्साहन दिया गया और उनके मुकदमे वापस लिए गये. इसके पीछे मंशा को भी रही हो लेकिन इसका सीधा सीधा उल्टा असर पडा और तैयारी बनने लगी कासगंज जैसे काण्ड करने की .

पत्थरबाजों पर यदि कड़ी कार्यवाही हुई होती तो निश्चित तौर पर असामजिक तत्वों के साथ आतंकी लोगों के अन्दर के प्रकार का खौफ पैदा होता लेकिन आतंकियों के पुनर्वास के साथ सीरिया जैसे देशों से वापस आ रहे तमाम दुर्दांत आतंकियों के साथ नरमी का रवैया कहीं न कहीं सभ्य समाज के लिए घातक बन रहा है . कासगंज के उपद्रवियों पर यदि भविष्य में कश्मीर जैसी नीति अपनाई गयी तो यकीनन ये जनता की उन अपेक्षाओं से बहुत परे होगा जिन आशाओं और अपेक्षाओं के संग लोगों ने इस सरकार को चुना था. उन अपेक्षाओं में आतंक से सख्ती से निबटना प्रमुखता थी .

कासगंज में अभी उपद्रव जारी है लेकिन ये उपद्रव कश्मीर के तमाम कोनों में होने वाले उपद्रव जैसा ही है जहाँ पहले वहां के हिन्दुओं को एक एक कर के मारा गया और उसके बाद सीधे हिन्दू विहीन कश्मीर में सेना और पुलिस से मोर्चा ले लिया गया . यदि ऐसी नीति हर कहीं अपनाई गयी तो उस स्थान के हालात कश्मीर जैसे ही हो जायेगे और इसका सबसे बड़ा अघात जनमानस को लगेगा जो हर दिन इस आस में बिता रही है कि आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा . यकीनन कासगंज जैसे उपद्रव के बाद सरकार को मुकदमे वापस लेने जैसी नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा क्योंकि हाथों में उठा कर फेंका गया वो पत्थर केवल एक सैनिक की वर्दी पर चोट नहीं था अपितु ये राष्ट्र के सम्मान और अस्मिता पर घाव था और इसी के चलते आज कासगंज तो कल कहीं और के उपद्रवी , असामाजिक . पाकिस्तान प्रेमी और वतन के गद्दारों के हौसले बढ़ते रहेगे . 

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