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गंगा के स्वच्छ जल हेतु अपना लहू देने आया एक और संत… गंगा पर घमासान


पतित पावनी गंगा को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले संत स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद उर्फ़ प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल के बाद जहाँ पूरा हिन्दू समुदाय आक्रोशित है तथा मोदी सरकार से नाराज है तो वहीं एक और संत गंगाजल को स्वच्छ बनाने के लिए अपना लहू देने सामने आया है. गंगा की अविरलता की मांगों को लेकर अपने प्राणों की आहुति देने वाले स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के देहावसान के बाद संत गोपालदास भी बलिदान देने की राह पर बढ़ गए हैं. आपको बता दें कि संत गोपालदास भी पिछले 112 दिनों से उत्तराखंड के अलग-अलग स्थानों पर अनशन कर रहे हैं. बीते जून में उत्तराखंड की यात्रा पर आने के दौरान उन्होंने हिमालय में तबाही का मंजर देखा तो हिमालय और गंगा को बचाने के लिए 24 जून से अनशन पर बैठ गए.

संत गोपालदास शुक्रवार को ल पुरुष राजेंद्र सिंह के साथ हरिद्वार पहुंचे। अब वह यहां मातृसदन में ही रहकर अनशन करेंगे. जलपुरुष राजेंद्र सिंह और जानेमाने पर्यावरणविद रवि चोपड़ा के साथ आए संत गोपालदास ने बताया कि वह भी गंगा की रक्षा के लिए पिछले 111 दिनों से आमरण अनशन कर रहे हैं. पहले उन्होंने बदरीनाथ, जोशीमठ और फिर ऋषिकेश में आमरण अनशन किया. अनशन की शुरूआत उन्होंने 24 जून को की थी. तीन दिन पहले से वे जल भी त्याग चुके हैं. उन्होंने कहा कि उनका अनशन स्वामी सानंद के अनशन के समर्थन में है और अब वह मातृसदन में ही रहकर उसी कमरे में अनशन करेंगे जहां स्वामी सानंद ने अनशन किया था.

स्वामी शिवानंद, जल पुरुष रोजेंद्र सिंह, पर्यावरणविद रवि चोपड़ा, अधिवक्ता अरुण भदौरिया और हिंदू क्रांति दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजीव चौधरी आदि के आग्रह पर गोपालदास ने जल तो ग्रहण कर लिया, लेकिन गंगा की अविरलता की मांग पूरी होने तक अनशन जारी रखने की बात कही. गोपालदास के अनशन की सूचना मिलते ही न सिर्फ उत्तराखंड सरकार बल्कि केंद्र सरकार के हाथपांव भी फूल गये हैं. मातृसदन के ब्रह्मचारी दयानंद ने बताया कि संत गोपालदास अब यहीं अनशन करेंगे. गोपालदास के साथ आए गंगा आह्वान के संयोजक हेमंत ध्यानी ने बताया कि गोपालदास वर्ष 2011 में स्वामी निगमांनद के बलिदान से पहले मातृसदन में ही काफी समय तक रहे. उस समय उन्होंने स्वामी निगमानंद की काफी सेवा की थी. स्वामी निगमानंद के बलिदान से ही उन्हें गंगा और पर्यावरण के प्रति कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिली. बाद में वे गुहाना हरियाणा चले गए जहां उन्होंने गौचरान की भूमि बचाने को बड़ा आंदोलन चलाया.


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