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पहली बार किसी प्रधानमन्त्री ने याद किया हुतात्मा वीर सावरकर जी को… देखी वो जेल जहाँ कोल्हू में लगाये गये थे सावरकर जी

संभवतः ऐसा पहली बार था जब आजाद भारत के किसी प्रधानमन्त्री ने इस तरह से भारतमाता के बलिदानी सपूत, अमर हुतात्मा वीर सावरकर जी को याद किया था. बता दें कि प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी रविवार को अंडमान दौरे के दौरान उस सेलुलर जेल पहुंचे जहाँ कभी वीर सावरकर को कैद करके रखा गया था. प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने उसी सेलुलर जेल जाकर वीर सावरकर जी को याद, उनको नमन वंदन किया, जिस सेलुलर जेल में सावरकर जी को कालापानी की सजा सुनाई गई थी तथा कोल्हू में बैल की तरह प्रयोग किया था.

अंडमान दौरे के दौरान प्रधानमन्त्री जी ने सी-वॉल समेत कई परियोजनाओं की नींव रखी। मोदी ने रॉस आइलैंड, नील आइलैंड और हैवलॉक आइलैंड के नाम बदलने का ऐलान किया. इन्हें क्रमश: नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीद और स्वराज नाम दिया गया तथा इसके बाद सेलुलर जेल गए. बता दें कि अमर क्रांतिकारी, राजनीतिक चिंतक और प्रखर हिंदुत्व के जनक विनायक दामोदर सावरकर को नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षडयंत्र कांड में 7 अप्रैल, 1911 को काला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया था. सावरकर 4 जुलाई, 1911 से 21 मई, 1921 तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में रहे थे.

सेलुलर जेल की जिस कोठरी में वीर सावरकर जी को कैद करके रखा गया था, पीएम मोदी उस कोठरी में वीर सावरकर की फोटो के सामने आंख बंदकर बैठे रहे. ब्रिटिश काल में इस जेल में राजनीतिक कैदियों को रखा जाता था. कैदियों के साथ इस जेल में अमानवीय बर्ताव किया जाता था. पोर्ट ब्लेयर की इस सेलुलर जेल में भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को रखा जाता था और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं. यहां सभी कैदियों को एक-दूसरे से अलग रखा जाता था और उनको यातनाएं दी जाती थी.

चूंकि ये इलाका भारत की मुख्यभूमि से हजारों किलोमीटर दूर था और जेल के चारों तरफ का इलाका पानी से घिरा था. इसलिए इसे ‘कालापानी की सजा’ भी कहा जाता था. उस वक्त इस जेल में 696 सेल बनाई गई थी. इस जेल से कोई भी कैदी चाहकर भी भाग नहीं सकता था. यहां क्रांतिकारियों से कोल्हू से तेल निकलवाने का काम भी कराया जाता था, उनपर कोड़े बरसाए जाते थे. जबकि कोठरी में एक लकड़ी का बिस्तर, कंबल और मिट्टा का बर्तन रखने की ही अनुमति होती थी. यहां शौचालय इस्तेमाल करने का भी एक समय निश्चित होता था और उसी दौरान कैदी शौचालय जा सकते थे. आजादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेज बहुत से नेताओं को अंडमान की इस जेल में कैद करके रखते थे. पोर्ट ब्लेयर में ही 30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने दूसरे विश्व युद्ध में जापानियों द्वारा इन द्वीपों पर कब्जा किए जाने के बाद यहां पहली बार तिरंगा फहराया था.

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