समय-पैसा बचाने के लिए नीति आयोग का प्लान, एक साथ हो विधानसभा-लोकसभा चुनाव

नई दिल्ली : नीति आयोग ने हाल ही में एक बड़ा सुझाव दिया है। जिसमें कहा गया है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने चाहिए जिससे सरकारी कार्यों में आ रही रुकावटों को कुछ हद तक कम किया जा सकें। इसके साथ ही चुनावी खर्चे भी एक हद तक ही हो। नीति आयोग की मानें तो हो सकता है कि प्रस्ताव को लागु करने के लिए कुछ राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल घट और बढ़ भी सकता है। आपको बता दें कि इससे पहले भी राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए कह चुके है।

इधर, नीति आयोग ने नोडल एजेंसी यानी चुनाव आयोग को इस पर गौर करने को कहा है और एकसाथ चुनावों का रोडमैप तैयार करने के लिए संबंधित पक्षकारों का एक कार्यसमूह गठित करने का सुझाव दिया। इस संबंध में 6 महीने के अंदर रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाना है और इसका अंतिम खाका अगले मार्च तक तैयार होगा। रोडमैप तैयार होने के बाद इस रिपोर्ट को 23 अप्रैल को नीति आयोग के गवर्निंग काउंसिल के सदस्यों के बीच रखा जाएगा, जिसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और अन्य कुछ लोग शामिल होंगे।

नीति आयोग की इस मसौदा रिपोर्ट में लिखा है कि भारत में सभी चुनाव स्वतंत्र निष्पक्ष और समकालिन तरीके से होने चाहिए जिससे की शासन व्यवस्था में प्रचार मोड के कारण होने वाले व्यवधान को कम किया जा सके। हम 2024 के चुनाव से इस दिशा में काम शुरु कर सकते है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि चुनाव आयोग को लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों से परामर्श लेनी होगी।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले ये भी कहा था कि यदि चुनाव एक साथ नहीं होते है तो इससे हम सभी को नुकसान होगा पर केवल एक सरकार या एक पार्टी ये बदलाव नहीं कर सकती है। सभी को एक साथ इस ओर चलना होगा। जैसा की देश में कहीं ना कही। चुनाव होते रहते हैं तो इस कारण से देश के सरकारी पैसे को चपत लगती ही रहती है। आपको बता दें कि 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में 1,100 करोड़ रुपये खर्च हुए थे और 2014 के चुनाव में लगभग 4,000 करो़ड़ रुपये खर्च हुए।

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