राष्ट्र खुश था कि अब आतंकियों का नहीं निकलेगा जनाजा लेकिन अचानक बोल पडी कांग्रेस

हिंदुस्तान की राजनीति का स्तर इतना ज्यादा गिर गया है कि देश के तमाम राजनेता अपनी जान पर खेलकर हिंदुस्तान तथा हिन्दुस्तानियों की रक्षा करने वाली भारतीय सेना पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते. एकतरफ जहाँ भारतीय सेना के जवान जहाँ बॉर्डर पर खड़े होकर देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दे देते हैं लेकिन इससे अधिक शर्मनाक तथा दुखद कुछ भी नहीं हो सकता जब देश के तथाकथित राजेनता सेना के शौर्य पर सवाल उठायें, सेना को ही कटघरे में खड़ा करें. ऐसा एक नहीं कई बार हुआ है जब राष्ट्र रक्षक सेना पर सवाल उठाये गए हैं तथा सेना के नाम पर राजनीति की गई है. जिस फैसले पर पूरा राष्ट्र खुशी मना रहा था उस फैसले के खिलाफ खड़ी हो गई है कांग्रेस पार्टी

एक बार फिर राजनीति कहर बनकर टूटी है भारतीय सेना पर तथा सवाल उठाये गए हैं भारतीय सेना की रणनीति तथा पराक्रम पर. देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस तथा उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सवाल उठाये हैं आतंकियों के खिलाफ सेना की उस कार्यवाही पर जिसमे कहा गया है कि भारतीय सेना अब आतंकियों के शव उनके परिजनों को नहीं सौंपेगी बल्कि स्वयं दफ़न कर देगी. सेना की इस रणनीति पर कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि ये निर्णय बिलकुल भी उचित नहीं है तथा इससे घाटी के लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जिससे घाटी के हालत और ख़राब होंगे. वहीं इसके अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कहा है कि आतंकियों के शव उनके परिजनों को न सौपना मानवाधिकार का उललंघन होगा. एनसी ने कहा है कि आखिर परिजनों से किसी के शव शव को दूर करना कहाँ की मानवता है? एनसी ने कहा है कि ये फैसला वापस लेना चाहिए.

कांग्रेस तथा एनसी को आतंकियों के शव उनके परिजनों को न सौंपने में मानवाधिकार की याद आ गई लेकिन इनको उस समय मावधिकार याद नहीं आता जब ये आतंकी भारतीय सेना के जवानों पर हमला करते हैं, उनकी जान लेते हैं. आखिर देश के राजनेताओं तथा बुद्धिजीवियों को सारे मानवाधिकार आतंकियों के लिए ही क्यों आगे आते हैं? आखिर इन तथाकथित राजनेताओं की हमदर्दी देश के दुश्मन दुर्दांत आतंकियों के प्रति ही क्यों जागती है?

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