बुरे दिन: पहले अविश्वास प्रस्ताव पर मुंह की खाई,, अब 41 साल बाद राज्यसभा उपसभापति का पद भी खोया कांग्रेस ने

2014 लोकसभा चुनाव से शुरू हुआ कांग्रेस पार्टी का हार का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. जब जब कांग्रेस खुद को BJP तथा मोदी जी के मुकाबले खड़ा करने की कोशिश करती है तब तब कांग्रेस को कोई न कोई झटका लग जाता है. आज कांग्रेस पार्टी को उस समय बड़ा झटका लगा जब राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में भाजपा नीत गठबंधन NDA के उम्मेदवार हरिवंश सिंह ने कांग्रेस के हरिप्रसाद को हरा दिया. ये कांग्रेस पार्टी के बुरे दिन ही कहे जायेंगे कि 41 साल के लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस पार्टी ने राज्यसभा में उपसभापति पद खोया है. अब संसद के दोनों सदन लोकसभा तथा राज्यसभा के चारौ शीर्ष पद लोकसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, राज्यसभा सभापति(उपराष्ट्रपति) तथा उपसभापति कांग्रेस के पास नहीं हैं.

आपको बता दें कि साल 1977 से उच्च सदन राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता सदन में उपसभापति का पद संभाल रहे हैं. रामनिवास मिर्धा 1977 में इस पद पर आसीन हुए थे तब से लेकरसदन में सभी उपसभापति कांग्रेस पार्टी से ही रहे हैं. पहली बार जब 2002 में बीजेपी नेता भैरोसिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बने थे तब भी यह सिलसिला जारी रहा और कांग्रेस पार्टी के नेता ने ही उपसभापति का पद संभाला था. उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति भी होता है. लेकिन आज इतिहास बदल गया तथा लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस राज्यसभा उपसभापति का पद भी गँवा बैठी. 44 सदस्यों की राज्यसभा में इस बार जीत के लिए 123 सासंदों का समर्थन चाहिए था.  एनडीए के सदस्य को 125 वोट मिले, वहीं यूपीए को 105 वोट मिले, इसी के साथ कांग्रेस ने 41 साल बाद एक और बड़ा पद गंवा दिया.

मई 1952 में कांग्रेस के एसवी कृष्णमूर्ति राव इस पद पर चुने जाने वाले पहले सदस्य थे. वह दो बार इस पद पर रहे. दिसंबर 1969 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया बीडी खोबरागडे पहले गैर कांग्रेसी सदस्य थे, जो इस पद पर चुने गए. उनके बाद संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के गोडे मुराहरि दो बार इस पद पर चुने गए. 1977 से अब तक कांग्रेस सदस्य ही उपसभापति पद पर चुना गया. करीब 41 साल बाद ये पहला मौका है, जब कांग्रेस के अलावा किसी दूसरी पार्टी का सदस्य इस पद के लिए चुना गया है.  नजमा हेपतुल्ला सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहीं. कांग्रेस सदस्य के तौर पर वह सबसे पहली बार 1985 से 1986 तक इस पद पर रहीं. दूसरी बार वह 1988 में उपसभापति चुनी गईं. इसके बाद वह 2004 तक लगातार इस पद पर रहीं. इस तरह वह लगातार 16 साल तक इस पद पर रहीं. उसके बाद वह भाजपा में शामिल हो गईं.


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