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NRC सत्यापन ने सिर्फ बांग्लादेशियों की ही नहीं, पोल खोली है तथाकथित सेक्युलर राजनेताओं की भी… जानिये कौन निकला सबसे बड़ा डिफॉल्टर ?

असम में NRC ड्राफ्ट जारी होने के बाद बांग्लादेशी घुसपैठियों की तो पहचान हुई ही है लेकिन उन राजनेताओं का काला चेहरा भी सामने आया है जो NRC ड्राफ्ट सामने आने के बाद सबसे हो हल्ला मचाये हुए हैं. भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त शैलेश ने बुधवार को कहा कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) संबंधी प्रमाणन प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल सबसे बड़ा डिफॉल्टर था तथा पश्चिम बंगाल सरकार NRC अधिकारियों द्वारा माँगए गए उपलब्ध तक नहीं करा सकी लेकिन जब NRC जारी हो गया तो उसके बाद सबसे ज्यादा विरोध ममता बनर्जी ही कर रही हैं.

ज्ञात हो कि एनआरसी संबंधी प्रमाणन प्रक्रिया उन लोगों से संबंधित हैं जो किसी दूसरे राज्य से हैं, लेकिन विभिन्न कारणों से असम में रहते हैं. एनआरसी से जुड़ी समूची प्रक्रिया को देखने वाले भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त (आरजीआई) शैलेश ने यह भी कहा कि उन्होंने एनआरसी अधिकारियों द्वारा मांगे गए दस्तावेज एकत्र करने में पश्चिम बंगाल सरकार की मदद के लिए अपने खुद के स्टाफ तक को लगा दिया, लेकिन प्रयास बेकार रहे. शैलेश ने कहा, ”सभी राज्यों में पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य था जहां से हमें ज्यादातर दस्तावेज नहीं मिले. हमें संघर्ष करना पड़ा. हमें फॉलो अप करना पड़ा. पश्चिम बंगाल से हमें संतोषजनक संख्या में दस्तावेज नहीं मिले. पश्चिम बंगाल का जवाब संतोषजनक नहीं था.” शैलेश ने यह भी कहा कि एनआरसी अधिकारियों और पश्चिम बंगाल के अधिकारियों के बीच वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक हुई और पश्चिम बंगाल से जवाब देने का आग्रह किया गया. उन्होंने कहा, ”पश्चिम बंगाल अपवाद के रूप में एकमात्र ऐसा राज्य था जहां राज्य सरकार की मदद करने के लिए मुझे खुद का स्टाफ लगाना पड़ा. लेकिन हमें एनआरसी मसौदे के लिए सभी जरूरी दस्तावेज नहीं मिले.”

पश्चिम बंगाल द्वारा उपलब्ध न कराए गए दस्तावेजों की संख्या के बारे में पूछे जाने पर शैलेश ने कहा कि यह एक ”बड़ी संख्या” होगी. आरजीआई की ये टिप्पणियां काफी मायने रखती हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी असम में एनआरसी मसौदे को लेकर भाजपा और केंद्र सरकार पर लगातार हमला बोल रही हैं. आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि एक आकलन के मुताबिक पश्चिम बंगाल ने एनआरसी अधिकारियों द्वारा भेजे गए 1.14 लाख दस्तावेजों में से केवल छह प्रतिशत का ही जवाब दिया. सूत्रों ने बताया कि एनआरसी के अंतिम मसौदे में कम से कम पांच लाख लोगों का नाम इसलिए शामिल नहीं किया गया क्योंकि दूसरे राज्य और केंद्रीय संगठन इन लोगों द्वारा किए गए नागरिकता के दावों की जांच करने और प्रमाणन के परिणाम वापस भेजने में असफल रहे.

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