लखनऊ हाईकोर्ट के फैसले के बाद एक बार फिर से झूम उठे SC / ST एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे सवर्ण हिन्दू


जिस मामले ने आज कल देश की दिशा को बदल दिया है उसी मुद्दे पर पहले सुप्रीम कोर्ट ने और अब हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला दिया है जो एक बहुत बड़े राहत के जैसा है उन सवर्ण हिन्दुओ के लिए जो आये दिन इस एक्ट का हो रहे हैं शिकार . ज्ञात हो कि नॉएडा में एक ADM द्वारा सेना एक एक रिटायर्ड कर्नल को इस मामले में लपेटने के बाद हुए हंगामे से चला ये सिलसिला भारत बंद तक पहुचा और अब ये मामला लाया गया था लखनऊ हाईकोर्ट में जिस पर वो फैसला आया है जिस से झूम उठे हैं सवर्ण हिन्दू . ये फैसला तब आया जब इसी एक्ट में वांछित एक व्यक्ति ने अपनी गिरफ्तारी को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी . उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के कांडरे थाने में 19 अगस्त 2018 को एससी एसटी एक्ट की धारा में एक मुकदमा लिखा गया था। यह मुकदमा शिवराजी देवी द्वारा राजेश मिश्रा व अन्य 3 लोगों के खिलाफ दर्ज कराया गया था।

ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार के गले की फांस बनता जा रहा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम अब के बार फिर से ले रहा है करवट . इसी मामले में दर्ज एक मुद्दे के खिलाफ दायर याचिका सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि जिन मामलों में अपराध सात वर्ष से कम सजा योग्य हो, उनमें गिरफ्तारी की जरूरत नहीं है। बता दें कि कोर्ट ने 19 अगस्त 2018 को दर्ज हुई एफआईआर को रद्द करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कहीं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका पर बहस के बाद अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि जिन केसों में सजा 7 साल से कम है उनमें बगैर नोटिस गिरफ्तारी ना की जाये। ऐसे मामलों में मुकदमा विवेचक स्वयं से यह सवाल करें कि आखिर गिरफ्तारी किस लिए आवश्यक है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ लहजे में कहा है कि गिरफ्तारी से पहले अभियुक्त को नोटिस देकर पूछताछ के लिए बुलाया जाए और यदि अभियुक्त नोटिस की शर्तो का पालन करता है, तो उसे दौरान विवेचना गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।  बता दें कि गोंडा निवासी राजेश मिश्र ने अपने ऊपर दर्ज एससी/एसटी एक्ट के मुकदमें को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चैलेंज किया था और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी। इस याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में सुनवाई शुरू हुई और न्यायमूर्ति अजय लांबा और न्यायमूर्ति संजय हरकौली की डबल बेंच ने राजेश मिश्रा को राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। इस याचिका पर अपने फैसले को विस्तार देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अरनेश कुमार के केस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को दोहराया और उसका पालन करने का आदेश जारी किया है।

 


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