हिंदुत्व की हर जाति कैसे खड़ी थी महाराणा प्रताप के साथ .. जानिए खुद और बताइये आतताइयों के प्रभाव में चल रहे जातिवादियों को भी

वो योद्धा महाराणा प्रताप जो एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे, आज वो योद्धा अपने बीच से ही निकले कुछ विधर्मियो की संगति में रहने वालों के निशाने पर है .. ये राष्ट्र का दुर्भाग्य रहा कि महाराणा प्रताप के खिलाफ इतिहास और वर्तमान दोनों में विरोधी के रूप में दुश्मन से ज्यादा अपने ही लोग कहे जाने वाले गद्दार खड़े मिले जिन्होंने उनके लिए असमंजस की स्थिति पैदा की ..
जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकरआए| तब माँ का जवाब मिला- “उस महान देश की वीर भूमिहल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था |( “बुक ऑफ़प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं | )
महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था| कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी| लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया | हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं| इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है| लेकिन इनका इतिहास छिपाया गया क्योंकि राजनीति की रोटी सेंकनी थी कुछ को और कुछ को बनाने थे अपने जातिवादी दल .
हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था | महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा “श्री जैमल मेड़तिया जी” ने दी थी जो 8000 हिन्दू वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 हिन्दू बलिदान हुए और 40000 मुगलों का वध करते हुए ..
काश कोई जातिवादियों को ये भी बता दे कि मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपने परिवार का अभिन्न सदस्य मानते थे और महाराणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे| आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील | फिर भी उस राणा का विरोध इतनी बेशर्मी के साथ ?
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