धारा 377 पर सिर्फ अदालत को कोसने से पहले एक बार सुनें इस जज का बयान… बेनकाब करता है कई छिपे चेहरों को


सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को खारिज किये जाने के बाद देश कला बड़ा वर्ग न्यायपालिका के इस निर्णय से आहत है तथा इस फैसले की आलोचना कर रहा है. लेकिन धारा 377 को लेकर कोर्ट पर सवाल उठा रहे लोगों को जवाब देने आये हैं खुद सुप्रीम कोर्ट के वो जज जो इस केस में शामिल थे. हम बात कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ की जिन्होंने अपने  बयान से कई चेहरों को बेनकाब किया है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि राजनेता कई बार जजों को शक्तियां क्‍यों सौंप देते हैं?

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को चुनौती देने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर फैसला अदालत के विवेक पर छोड़ने के सरकार के रुख पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड ने निराशा व्यक्त की और कहा कि नेताओं की तरफ से इस तरह की शक्तियों को न्यायाधीशों पर छोड़ने का काम रोजाना हो रहा है. न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ”नेता क्यों कई बार न्यायाधीशों को शक्ति सौंप देते हैं और हम सुप्रीम कोर्ट में इसे हर रोज होता देख रहे हैं. हमने धारा 377 मामले में देखा, जहां सरकार ने हमसे कहा कि हम इसे अदालत के विवेक पर छोड़ रहे हैं और ‘अदालत का यह विवेक’ जवाब नहीं देने के लिये मेरे लिये काफी लुभाने वाला सिद्धांत था इसलिये दूसरे दिन अपने फैसले में मैंने इसका जवाब दिया. जस्टिस चन्द्रचूड ने कहा कि धारा 377 मामले में फैसला औपनिवेशिक मूल के कानूनों और संवैधानिक मूल्यों का सही प्रतिनिधित्व करने वाले कानूनों के बीच लड़ाई की भावना का सही मायने में प्रतिनिधित्व करता है. न्यायाधीश ने यह भी कहा कि आजादी से पूर्व या औपनिवेशिक कानूनों की संवैधानिक न्यायशास्त्र के मूल्यों से सामंजस्य की आवश्यकता भी इस फैसले में प्रदर्शित हुई है. न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित 19वें वार्षिक बोध राज साहनी स्मृति व्याख्यान 2018 में ”संवैधानिक लोकतंत्र में कानून का राज” विषय पर बोल रहे थे.

समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने वाली आईपीसी की धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 158 साल पुराने इस प्रावधान के इतिहास का जिक्र किया है जिसे 1533 में ब्रिटेन के राजा हेनरी अष्टम के शासनकाल में बनाए गए कानून से लिया गया. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गुरुवार को अपने फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 ने समानता और गरिमा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन किया है. न्यायमूर्ति नरीमन और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने अलग लेकिन सहमति वाले फैसले में, धारा के विकास के बारे में विस्तार से बताया है. न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि धारा 377 ब्रिटेन के बगरी अधिनियम, 1533 पर आधारित है, जिसे तत्कालीन राजा हेनरी अष्टम ने बनाया था. बगरी अधिनियम के जरिये मानव जाति या जानवर के साथ बगरी (गुदा मैथुन) के “निंदनीय और घृणित अपराध” को प्रतिबंधित किया गया था. न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि “बगरी” शब्द पुराने फ्रांसीसी शब्द “बुग्रे” से लिया गया है और इसका मतलब गुदा मैथुन होता है.

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा, “हेनरी अष्टम द्वारा बनाया गये बगरी अधिनियम, 1533 में बगरी के लिये मौत की सजा का प्रावधान था और यह कानून तकरीबन 300 साल तक रहा. उसके बाद इसे रद्द कर दिया गया और उसकी जगह व्यक्ति के खिलाफ अपराध अधिनियम, 1828 बनाया गया. बगरी, हालांकि आईपीसी बनाए जाने के एक साल बाद यानि 1861 तक इंग्लैंड में एक ऐसा अपराध बना रहा, जिसके लिये मौत की सजा का प्रावधान था.” उन्होंने कहा कि धारा 377 को संविधान के अनुच्छेद 372 (1) के तहत स्वतंत्र भारत में जारी रखने की इजाजत दी गई. अनुच्छेद 372 (1) के अनुसार, “संविधान के लागू होने से पहले से प्रभावी सभी कानून तब तक जारी रहेंगे जब तक कि उन्हें बदल नहीं दिया जाता या निरस्त नहीं कर दिया जाता.” न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि इंग्लैंड और वेल्स में “अप्राकृतिक यौनाचार, गंभीर अश्लीलता या अन्य अप्राकृतिक आचरणों” के लिए 1806 और 1900 के बीच 8921 लोगों को दोषी पाया गया. औसतन, इस अवधि के दौरान प्रति वर्ष 90 पुरुषों को समलैंगिक अपराधों के लिए दोषी पाया गया. उन्होंने कहा, “दोषी ठहराए गए ज्यादातर लोगों को कैद की सजा दी गई लेकिन 1806 और 1861 के बीच 404 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी. 56 लोगों को फांसी दी गई और शेष को या तो कैद की सजा दी गई या उन्हें शेष जीवन के लिये ऑस्ट्रेलिया भेज दिया गया.” 1861 में अप्राकृतिक यौनाचार के अपराध के लिये मौत की सजा के प्रावधान को खत्म कर दिया गया था.

देश में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि तत्कालीन संसद ने भारतीय विधि आयोग की स्थापना की थी और 1833 में, थॉमस बाबिंगटन मैकॉले को इसका प्रमुख नियुक्त किया गया था. न्यायमूर्ति नरीमन ने लिखा कि लॉर्ड मैकॉले का मसौदा आखिरकार बनाई गई धारा 377 से काफी अलग था. उन्होंने लिखा कि यहां तक ​​कि लॉर्ड मैकॉले ने भी सहमति के साथ किए जाने पर “अप्राकृतिक यौनाचार” के अपराध के लिए कम सजा का प्रावधान रखा था. न्यायमूर्ति नरीमन ने अपने 96 पन्नों के फैसले में कहा कि मसौदे की कई समीक्षाओं के बाद आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मसौदा दंड संहिता पर्याप्त रूप से पूर्ण है, और मामूली संशोधन के साथ कानून बनाए जाने के लिये उपयुक्त है. उन्होंने लिखा, “दंड संहिता का संशोधित संस्करण तब 1851 में कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और कलकत्ता में सदर कोर्ट के न्यायाधीशों को भेजा गया.” न्यायमूर्ति नरीमन ने लिखा है कि दंड संहिता की समीक्षा के लिये बेथून (भारतीय विधान परिषद के विधायी सदस्य), कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बुलर, जस्टिस कोल्विल, सर बार्न्स पीकॉक को लेकर एक परिषद का गठन किया गया. न्यायमूर्ति नरीमन ने लिखा कि पीकॉक कमेटी ने अंततः कानून बनाने के लिए धारा 377 के समतुल्य मसौदे को भेजा. 25 वर्ष के पुनरीक्षण के बाद, 1 जनवरी, 1862 को आईपीसी लागू हो गया. आईपीसी ब्रिटिश साम्राज्य में पहली संहिताबद्ध अपराध संहिता थी.


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