भारत में खुलने जा रही शरिया अदालतें.. मतलब अब कटते सर और पत्थरों की बौछार दिखेगी हर चौराहों पर.. फिर भी जिंदाबाद है धर्मनिरपेक्षता

देश अब संविधान से नहीं बल्कि इस्लामिक शरिया लॉ से चलेगा. देश में अब वो दृश्य दिखाई देगा जो ईरान, सीरिया व अन्य इस्लामिक मुल्कों में दिखाई देता है जब कोई इस्लामिक नियम के खिलाफ काम करता है अर्थात सरेआम कटते हुए सर, पत्थरों की बौछारें आदि. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एलान कर दिया है कि वह देश के हर जिले में शरिया अदालत खोलेगा.

आश्चर्य की बात है कि इस्लामिक आर्गेनाइजेशन सरेआम भारतीय न्यायपालिका को चुनौती देता है तथा उसके समानांतर शरिया कोर्ट बनाने का एलान कर देता है, लेकिन इस पर देश का संविधान खतरे में नहीं आता.  ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने कहा है कि वो वकीलों, न्यायाधीशों और आम लोगों को शरिया कानून से परिचित कराने के लिए कार्यक्रमों को और तेज करने पर विचार करेगा. बोर्ड की कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य जफरयाब जीलानी ने बताया था कि अब बदलते वक्त में यह जरूरत महसूस की जा रही है कि तफहीम-ए-शरीयत कमेटी को और सक्रिय करते हुए इसका दायरा बढ़ाया जाए. उन्होंने कहा कि बोर्ड अब यह कोशिश कर रहा है कि हर जिले में शरिया अदालतें हों, ताकि मुस्लिम लोग अपने शरिया मसलों को अन्य अदालतों में ले जाने के बजाय दारुल-क़ज़ा में सुलझायें. उन्होंने कहा कि इस वक्त उत्तर प्रदेश में करीब 40 दारुल-क़ज़ा हैं. कोशिश है कि हर जिले में कम से कम एक ऐसी अदालत जरूर हो. एक अदालत पर हर महीने कम से कम 50 हजार रुपये खर्च होते हैं. अब हर जिले में दारुल-क़ज़ा खोलने के लिये संसाधन जुटाने पर विचार-विमर्श होगा.

जब देश में शरिया अदालतें खुलेंगी तो अगर आप इस्लामिक कानून को नहीं मानते हैं तो आपको उसी अंदाज में सजा मुइलेगी जैसे ईरान, सीरिया में मिलती है. चौराहे पर सर काटा जा सकता है, पत्थर की बौछारे की जा सकती है, आश्चर्य की बात ये है कि इस सबके बाद भी देश में धर्मनिरपेक्षता जिंदाबाद है. लेकिन यहां प्रश्न ये खड़ा होता है कि देश की संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका के समानांतर मजहबी अदालत खोलने की बात करना क्या संविधान तथा न्यायपालिका का अपमान नहीं है? क्या इससे देश का संविधान तथा लोकतान्त्रिक मूल्यों को खतरा पैदा नहीं होता है?

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