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जब भारत के खिलाफ एक हो गये थे इस्लामिक मुल्क तथा प्रधानमन्त्री थे नरसिम्हा राव.. तब उन्हें अटलजी में दिखी थी एकमात्र उम्मीद और पलट गया था पासा

भारतीय राजनीति के आकाश ध्रुवतारे रहे भारत रत्न पूर्व प्रधानमन्त्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी अटल बिहारी का देहांत हो गया है तथा इसके साथ ही हिंदुस्तान ने वो अनमोल हीरा खोया है जिसकी भरपाई होना असंभव है. आपने राजनैतिक जीवन में अटल जी ने देश के लिए कई ऐसे काम किये जिन्हें आज जब भी याद किया जाता है तो अटल जी की मुस्कुराती हुई अटल छबि आँखों के सामने स्वतः ही सामने आ जाती है. अटल जी का एक ऐसा ही अनसुना महानतम किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं जिसे जानकर आप अटल जी को नतमस्तक किये बिना नहीं रह सकेंगे.

सभी जानते हैं कि अटल जी का सम्मान उनके विरोधी भी करते थे तथा उनसे प्रेरणा लेते थे. बात साल 1994 की है जभ केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तथा पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमन्त्री थी व अटल जी विपक्ष के नेता थे. विपक्ष में होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी को नरसिम्हा राव सरकार की तरफ से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग भेजे गए प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनाया गया. 27 फरवरी 1994 को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) के जरिए प्रस्ताव रखा. उसने कश्मीर में हो रहे कथित मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर भारत की निंदा की. संकट यह था कि अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता तो भारत को UNSC के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता. पाकिस्तान आपने प्रयासों में सफल होता भी दिखा जब ज्यादातर इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान के समर्थन में आ गये तथा प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव देश पर आये इस संकट को देख बेहद ही चिंतित तथा परेशान हो गये.

कश्मीर मुद्दे पर बेहद ही कड़ी चुनौती का का सामना कर रहे तत्कालीन पीएम नरसिम्हा राव को अटल जी में उम्मीद की किरण दिखाई दी. प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने जिनेवा में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए सावधानीपूर्वक एक टीम बनाई. इस प्रतिनिधिमंडल में तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, ई. अहमद, नैशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला और हामिद अंसारी तो थे ही, इनके साथ अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे. वाजपेयी उस समय विपक्ष के नेता थे और उन्हें इस टीम में शामिल करना मामूली बात नहीं थी लेकिन नरसिम्हा राव जानते थे कि अटल जी इस संकट से देश को निकालेंगे. इसके बाद नरसिम्हा राव और वाजपेयी ने उदार इस्लामिक देशों से संपर्क शुरू किया. राव और वाजपेयी ने ही OIC के प्रभावशाली 6 सदस्य देशों और अन्य पश्चिमी देशों के राजदूतों को नई दिल्ली बुलाने का प्रबंध किया. दूसरी तरफ, अटल बिहारी वाजपेयी ने जिनेवा में भारतीय मूल के व्यापारी हिंदूजा बंधुओं को तेहरान से बातचीत के लिए तैयार किया. वाजपेयी इसमें सफल हुए. ये अटल जी का ही करिश्मा था कि प्रस्ताव पर मतदान वाले दिन जिन देशों के पाकिस्तान के समर्थन में रहने की बात कही थी उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए. इंडोनेशिया और लीबिया ने OIC द्वारा पारित प्रस्ताव से खुद को अलग कर लिया. सीरिया ने भी यह कहकर पाकिस्तान के प्रस्ताव से दूरी बना ली कि वह इसके रिवाइज्ड ड्राफ्ट पर गौर करेगा. 9 मार्च 1994 को ईरान ने सलाह-मशवरे के बाद संशोधित प्रस्ताव पास करने की मांग की.चीन ने भी भारत का साथ दिया. अपने दो महत्पूर्ण समर्थकों चीन और ईरान को खोने के बाद पाकिस्तान ने शाम 5 बजे प्रस्ताव वापस ले लिया तथा एक समय हार के किनारे पर खड़ा भारत विजयी हुआ तथा विपक्ष में होने के बाद भी अटल जी ने हिंदुस्तान को गौरवान्वित किया.

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